Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 6

97 Mantra
33/6
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒यमि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठोऽअध्व॒रेष्वीड्यः॑।यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरु॒चुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भ्वं वि॒शेवि॑शे॥६॥

अ॒यम्। इ॒ह। प्र॒थ॒मः। धा॒यि॒। धा॒तृभि॒रिति॑ धा॒तृऽभिः॑। होता॑। यजि॑ष्ठः। अ॒ध्व॒रेषु॑। ईड्यः॑ ॥ यम्। अप्न॑वानः। भृग॑वः। वि॒रु॒रु॒चुरिति॑ विऽरुरु॒चुः। वने॑षु। चि॒त्रम्। वि॒भ्व᳖मिति॑ वि॒भ्व᳖म्। वि॒शवि॑शे॒ इति॑ वि॒शेऽवि॑शे ॥६ ॥

Mantra without Swara
अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्हाता यजिष्ठोऽअध्वरेष्वीड्यः । यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रँविभ्वँविशेविशे ॥

अयम्। इह। प्रथमः। धायि। धातृभिरिति धातृऽभिः। होता। यजिष्ठः। अध्वरेषु। ईड्यः॥ यम्। अप्नवानः। भृगवः। विरुरुचुरिति विऽरुरुचुः। वनेषु। चित्रम्। विभ्वमिति विभ्वम्। विशविशे इति विशेऽविशे॥६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हमें १. गतमन्त्र में वर्णित प्रकार से धात्रीद्वय [श्री+लक्ष्मी] का स्तन्यपान करके जो अपना धारण करते हैं उन्हीं (धातृभिः) = उत्तम प्रकार से धारण करनेवालों से (इह) = इस मानव-जीवन में (अयम् प्रथमः) = यह चतुर्थ मन्त्र का 'पूर्व्य' = सबसे प्रथम होनेवाला परमेष्ठी प्रभु (धायि) = धारण किया जाता है। प्रभु का धारण वही कर पाता है जो शरीर को नीरोग रखता [हरि] है [ख] शरीर के धारण के लिए ही भोजनाच्छादन का प्रयोग करता [स्वधावान् ] है [ग] ज्ञानाग्नि से मन के मैलों को जलाकर चमकता है [शुक्र] तथा विलास में न फँसने से तेजस्वी होता है। २. ये प्रभु ही [क] (होता) = सब-कुछ देनेवाले हैं। क्या धन और क्या ज्ञान ये प्रभु ही प्राप्त कराते हैं। [ख] (यजिष्ठः) = ये सर्वोत्तम वस्तुओं का हमारे साथ सम्बन्ध करनेवाले हैं। हम अज्ञानवश गलत वस्तु की भी कामना कर सकते हैं, प्रभु उत्तम ही वस्तुएँ प्राप्त कराते हैं। [ग] हम उत्तम साधनों को प्राप्त करके जो भी लोकसंग्रह व परोपकार के उत्तम कर्म कर पाते हैं, उन सब (अध्वरेषु) = हिंसारहित यज्ञों में (ईड्य) = वे प्रभु ही स्तुति के योग्य हैं। वस्तुतः सब उत्तम कर्म प्रभु की शक्ति व कृपा से ही हो रहे होते हैं । ३. ये प्रभु वे हैं (यम्) = जिनको (अप्नवानः) = उत्तम यज्ञिय कर्मोंवाले लोग तथा (भृगवः) = ज्ञानाग्नि में अपना परिपाक करनेवाले तपस्वी ज्ञानी ही (विरुरुचुः) = प्रिय होते हैं। प्रभु का प्रिय बनने के लिए कर्म व ज्ञान का समन्वय आवश्यक है, क्योंकि वैदिक गणित का यही समीकरण है - ज्ञान + कर्म भक्ति। ४. ये प्रभु (वनेषु) = [वन = संभजन] अपने संभजन करनेवाले भक्तों में (चित्रम्) = ज्ञान को देनेवाले हैं। प्रभु अग्नि है, यह भक्त भी अग्नि-सा बन जाता है, इसकी ज्ञानाग्नि भी चमक उठती है । ५. जो व्यक्ति स्वार्थी न रहकर अपने जीवन को औरों के जीवन से जोड़ देता है वह 'विश' कहलाता है। (विशेविशे) = वसुधा को ही कुटुम्ब समझनेवाले प्रत्येक ऐसे व्यक्ति में (विश्वम्) = वे प्रभु [विभू = to become manifest in] प्रकाशित होते हैं। इनके जीवनों में प्रभु की शक्ति प्रकट होती है और सामान्य लोग ऐसे लोगों में प्रभु की महिमा का दर्शन करते हैं। इस शक्ति के अवतरण से ये सब शत्रुओं का संहार करके 'कुत्स' नामवाले हुए हैं। 'विभु' शब्द का अर्थ शक्तिशाली भी है। प्रभु को धारण करनेवाले ये प्रभु की शक्ति को धारण करके सचमुच शक्तिशाली हो गये हैं।
Essence
भावार्थ- हम कर्मनिष्ठ, तपस्वी, ज्ञानी बनकर प्रभु के प्रिय बनें, उपासक बनकर ज्ञान प्राप्त करें, सबके साथ अद्वैत का अनुभव करते हुए शक्तिशाली बनें, प्रभु की शक्ति का प्रकाश करनेवाले हों।
Subject
प्रभु के प्रिय कौन? [ प्रभु का प्रकाश किनमें ? ]