Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 56

97 Mantra
33/56
Devata- इन्द्रवायू देवते Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्र॑वायूऽइ॒मे सु॒ताऽउप॒ प्रयो॑भि॒रा ग॑तम्। इन्द॑वो वामु॒शन्ति॒ हि॥५६॥

इन्द्र॑वायूऽइ॒तीन्द्र॑वायू। इ॒मे। सु॒ताः। उप॑। प्रयो॑भि॒रिति॒ प्रयः॑ऽभिः। आ। ग॒त॒म्। इन्द॑वः। वा॒म्। उ॒शन्ति॑। हि ॥५६ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रवायूऽइमे सुताऽउप प्रयोभिरागतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि ॥

इन्द्रवायूऽइतीन्द्रवायू। इमे। सुताः। उप। प्रयोभिरिति प्रयःऽभिः। आ। गतम्। इन्दवः। वाम्। उशन्ति। हि॥५६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. मन्त्र का सरलार्थ यह है- (इन्द्रवायू) = इन्द्र और वायु (इमे) = ये (इन्दवः) = सोमकण (सुता:) = उत्पन्न किये गये हैं। ये सोमकण (हि) = निश्चय से (वाम्) = तुम दोनों - इन्द्र और वायु को (उशन्ति) = चाहते हैं। (प्रयोभिः) = सात्त्विक अन्नों से (उप आगतम्) = इन्हें समीपता से प्राप्त होओ। २. ये सोमकण अन्न का ही अन्तिम परिणाम हैं। यदि अन्न सात्त्विक होता है तो ये सोमकण भी सौम्य व शान्त होते हैं और शरीर में सुरक्षित रहते हैं। ये सोमकण 'इन्दवः ' कहे गये हैं, क्योंकि सारी शक्ति का मूल ये ही हैं- इन्द to be powerful. इन्हीं से जीवन का धारण होता है, इनकी समाप्ति के साथ जीवन समाप्त हो जाता है। ३. 'प्रयस्' शब्द अन्न का वाचक है, साथ ही यह प्रयत्न का वाचक भी है। दोनों अर्थों को मिलाने से यह भावना प्रतीत होती है कि 'जो अन्न प्रयत्न से प्राप्त किया गया है'। वस्तुत: प्रयत्न प्राप्त अन्न का सेवन शक्ति की रक्षा में सहायक है। ४. सोमकणों को शरीर में ही सुरक्षित करने के लिए इन्द्र=इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनना आवश्यक है। जितेन्द्रिय पुरुष ही वीर्यरक्षा कर पाता है। इन्द्रियों का दास बनने पर सोमशक्ति की रक्षा का प्रश्न ही नहीं रहता । इन्द्रियों का वशवर्ती न होने के लिए वायु बनना चाहिए। 'वा गतौ ' = निरन्तर क्रियाशील रहना चाहिए। अच्छे कार्यों में लगे रहेंगे तो बुरी भावनाएँ उत्पन्न ही नहीं होगी। आलसी को ही ये वासनाएँ सताती हैं । ५. प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि मधुच्छन्दा है । इसने प्रस्तुत मन्त्र में निम्न मधुर इच्छाएँ की हैं [क] (इन्द्र) = मैं इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनूँगा। [ख] (वायु) = मेरा जीवन सतत क्रियामय होगा। [ग] (प्रयस्) = मैं प्रयत्न से प्राप्त सात्त्विक अन्न का सेवन करनेवाला बनूँगा। [घ] (इन्दवः) = सोमकण शक्ति के स्रोत हैं, इस बात को न भूलूँगा ।
Essence
भावार्थ- हम सात्त्विक अन्न के सेवन से इन्द्रियों के अधिष्ठाता बनें तथा निरन्तर क्रिया में लगे रहने से सोम के प्रिय बनें, अर्थात् शक्ति की रक्षा करनेवाले हों।
Subject
सात्त्विक अन्न व शारीरिक स्वास्थ्य