Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 54

97 Mantra
33/54
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वेभ्यो॒ हि प्र॑थ॒मं य॒ज्ञिये॑भ्योऽमृत॒त्वꣳ सु॒वसि॑ भा॒गमु॑त्त॒मम्।आदिद् दा॒मान॑ꣳ सवित॒र्व्यूड्टर्णुषेऽनूची॒ना जी॑वि॒ता मानु॑षेभ्यः॥५४॥

दे॒वेभ्यः॑। हि। प्र॒थ॒मम्। य॒ज्ञिये॑भ्यः। अ॒मृ॒त॒त्वमित्य॑मृत॒ऽत्वम्। सु॒वसि॑। भा॒गम्। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम् ॥ आत्। इत्। दा॒मान॑म्। स॒वि॒तः॒। वि। ऊ॒र्णु॒षे॒। अ॒नू॒ची॒ना। जी॒वि॒ता। मानु॑षेभ्यः ॥५४ ॥

Mantra without Swara
देवेभ्यो हि प्रथमँयज्ञियेभ्यो मृतत्वँ सुवसि भागमुत्तमम् । आदिद्दामानँ सवितर्व्यूर्णुषे नूचीना जीविता मानुषेभ्यः ॥

देवेभ्यः। हि। प्रथमम्। यज्ञियेभ्यः। अमृतत्वमित्यमृतऽत्वम्। सुवसि। भागम्। उत्तममित्युत्ऽतमम्॥ आत्। इत्। दामानम्। सवितः। वि। ऊर्णुषे। अनूचीना। जीविता। मानुषेभ्यः॥५४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की भावना के अनुसार अपने हृदय को देवासन बनाकर सुहोत्र अब 'वामदेव' = सुन्दर दिव्य गुणोंवाला बन गया है। प्रभु 'सविता' हैं [षु प्रसवैश्वर्ययोः], 'सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करनेवाले हैं और यह सम्पूर्ण ऐश्वर्य उन्हीं प्रभु का ही है। हे (सवितः) = आप ही देवों को देवत्व प्राप्त करानेवाले हैं। प्रभु इन देवों को क्या-क्या प्राप्त कराते हैं, यह देखिए । २. (देवेभ्यः) = देवताओं के लिए (हि) = निश्चय से (यज्ञियेभ्य:) = जिन्होंने अपना जीवन यज्ञमय बनाया है (प्रथमम्) = सबसे पहले (अमृतत्वम्) = अमृतत्व, रोगराहित्य को (सुवसि) = प्राप्त कराते हो। ये यज्ञमय जीवनवाले देव रोगों का शिकार नहीं होते । रोग का सम्बन्ध भोग के साथ है ('भोगे रोगभयम्') । यज्ञमय जीवन के साथ तो अमरता का ही सम्बन्ध है । यज्ञिय जीवनवाले देव रोगाक्रान्त नहीं होते। २. जहाँ देवों को रोगशून्यता व उत्तम स्वास्थ्य मिलता है, वहाँ साथ ही उस उत्तम स्वास्थ्य को स्थिर रखने के लिए उत्तमं भागम् उत्तम भजनीय सेवनीय धन सुवसि = प्राप्त कराते हो। धन को 'भग' कहते हैं। समूचा धन यदि ' भग' है, तो उसमें से मुझे प्राप्त हानेवाला अंश ही मेरा 'भाग' है। वह सवितादेव इन यज्ञशील देवों को सात्त्विक, अकुटिल मार्ग से प्राप्त होनेवाला धन देते हैं। ३. (आत् इत्) = धन के साथ आप इन देवों को (दामानम् र्व्यूर्णुषे) = उदरबन्धन से आच्छादित करते हैं। इनका जीवन बड़ा संयत होता है। पेट पर मानो ये रस्सी बाँधे रखते हैं। ये दामोदर ही तो संयत जीवनवाले होते हैं। इन यज्ञिय देवों को प्रभु धन के साथ संयम शक्ति भी प्राप्त कराते हैं। ये धनों से भोगों के भोगने में नहीं लग जाते। उदर पर दाम बाँधे रखते हैं । ४. इस प्रकार (मानुषेभ्यः) = इन मनुष्यमात्र का हित करनेवाले संयमी जीवनवाले पुरुषों के लिए (जीविता) = जीवन के साधन [यैः जीवति तानि जीवितानि] (अनूचीना) = अनुकूल होते हैं। जब मनुष्य अपने जीवन को सुन्दर बनाने में लगता है तब प्रभु उसे अनुकूल जीवन-साधन प्राप्त कराते हैं।
Essence
भावार्थ- हम वामदेव बनें ताकि प्रभु से प्रसाद के रूप में अमृतत्व = स्वास्थ्य, उत्तम धन, संयम व अनुकूल जीवन प्राप्त कर सकें।
Subject
वामदेव को प्रभु का प्रसाद