Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 53

97 Mantra
33/53
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- सुहोत्र ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वे॑ देवाः शृणु॒तेम॒ꣳ हवं॑ मे॒ येऽअ॒न्तरि॑क्षे॒ यऽउप॒ द्यवि॒ ष्ठ।येऽअ॑ग्निजि॒ह्वाऽउ॒त वा॒ यज॑त्राऽआ॒सद्या॒स्मिन् ब॒र्हिषि॑ मादयध्वम्॥५३॥

विश्वे॑। दे॒वाः॒। शृ॒णु॒त॒। इम॑म्। हव॑म्। मे॒। ये। अ॒न्तरि॑क्षे। ये। उप॑। द्यवि॑। स्थ। ये। अ॒ग्नि॒जि॒ह्वा इत्य॑ग्निऽजि॒ह्वाः। उ॒त। वा। यज॑त्राः। आ॒स॒द्येत्या॑ऽस॒द्य। अ॒स्मिन्। ब॒र्हिषि॑। मा॒द॒य॒ध्व॒म् ॥५३ ॥

Mantra without Swara
विश्वे देवाः शृणुतेमँ हवम्मे येऽअन्तरिक्षे यऽउप द्यवि ष्ठ । येऽअग्निजिह्वाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयध्वम् ॥

विश्वे। देवाः। शृणुत। इमम्। हवम्। मे। ये। अन्तरिक्षे। ये। उप। द्यवि। स्थ। ये। अग्निजिह्वा इत्यग्निऽजिह्वाः। उत। वा। यजत्राः। आसद्येत्याऽसद्य। अस्मिन्। बर्हिषि। मादयध्वम्॥५३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'सुहोत्र' है-सु-होत्र, जिसने उत्तम हवन किया है। इसने गत मन्त्र में 'लुश' के रूप में सभी वासनाओं को जला दिया और अब अपने जीवन-यज्ञ की वेदि को पवित्र बनाकर यह देवों से कहता है-(विश्वेदेवाः) = सब देवो! (मे) = मेरी (इमम्) = इस (हवम्) = पुकार को (शृणुत) = सुनो। हे देवो ! (ये) = जो (अन्तरिक्षे) = अन्तरिक्ष में हो (ये) = जो उपद्यवि द्युलोक के समीप (स्थ) = हो (उत) = और (ये) = जो (अग्निजिह्वाः) = अग्नि को अपना वक्ता [Spokesman] बनाये हुए पार्थिव देव हो वा अथवा (यजत्राः) = आप सब जो यज्ञों के द्वारा हमारा त्राण करनेवाले हो, वे (अस्मिन्) = इस (बर्हिषि) = निर्वासन व विशाल हृदयान्तरिक्ष में (आसद्य) = बैठकर (मादयध्वम्) = मेरे जीवन को आनन्दमय बनाओ। २. 'ये पृथिव्यां एकादशस्थ, ये अन्तरिक्ष एकादशस्थ, ये दिवि एकादशस्थ' इन शब्दों में वेद ३३ देवों का संकेत कर रहा है। ११ पृथिवीस्थ देव हैं, ११ अन्तरिक्षस्थ और ११ द्युलोक के देव हैं। द्युलोकस्थ देवों का मुखिया सूर्य है, अन्तरिक्षस्थ देवों का मुखिया वायु व विद्युत् है और पृथिवीस्थ देवों का मुखिया अग्नि है। प्रस्तुत मन्त्र में अन्तरिक्ष व द्युलोक का तो स्पष्ट उल्लेख है, पृथिवीस्थ देवों को 'अग्निजिह्वा' शब्द से याद किया गया है, उनका अग्नि मानो वक्ता है। पृथिवीस्थ देवों का मुखिया अग्नि ही तो है। ३. (बर्हिः) = वेद में स्थान-स्थान पर हृदय को बर्हिः नाम से सूचित किया गया है। इस शब्द में मूलभावनाएँ दो हैं। [क] जहाँ से वासनाओं का उद्बर्हण कर दिया गया है, वह वासनारहित हृदय ही 'बहि:' है। [ख] 'बृहि वृद्धौ' से बनकर यह शब्द यह भावना दे रहा है कि वह हृदय 'बर्हि:' है, जो विशाल है, बढ़ा हुआ है। ४. इस हृदय में हम सब देवों का आमन्त्रण करते हैं। वास्तव में तो वासनओं को निकाल देने पर देव उस खाली स्थान को भरने के लिए स्वयं आ ही जाते हैं। देवों के लिए पवित्रस्थान बनाने के लिए ही हृदय का मार्जन किया गया है। जब हृदय के अन्दर दिव्य भावनाएँ आती हैं तब वहाँ प्रकाश व आनन्द का होना स्वाभाविक है।
Essence
भावार्थ - हम 'सुहोत्र' बनकर अग्निकुण्ड में सब वासनाओं को भस्म कर दें और अपने हृदय को देवासन बनाकर आनन्द का लाभ करें।
Subject
मेरा हृदय देवासन बने