Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 51

97 Mantra
33/51
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- कूर्म ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒र्वाञ्चो॑ऽअ॒द्या भ॑वता यजत्रा॒ऽआ वो॒ हार्दि॒ भय॑मानो व्ययेयम्। त्राध्वं॑ नो देवा नि॒जुरो॒ वृक॑स्य॒ त्राध्वं॑ क॒र्त्ताद॑व॒पदो॑ यजत्राः५१॥

अ॒र्वाञ्चः॑। अ॒द्य। भ॒व॒त॒। य॒ज॒त्राः॒। आ। वः॒। हार्दि। भय॑मानः। व्य॒ये॒य॒म् ॥ त्राध्व॑म्। नः॒। दे॒वाः॒। नि॒जुर॒ऽइति॑ नि॒जुरः॑। वृक॑स्य। त्राध्व॑म्। क॒र्त्तात्। अ॒व॒पद॒ इत्य॑व॒ऽपदः॑। य॒ज॒त्राः॒ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
अर्वाञ्चोऽअद्या भवता यजत्रा आ वो हार्दि भयमानो व्ययेयम् । त्राध्वन्नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वङ्कर्तादवपदो यजत्राः ॥

अर्वाञ्चः। अद्य। भवत। यजत्राः। आ। वः। हार्दि। भयमानः। व्ययेयम्॥ त्राध्वम्। नः। देवाः। निजुरऽइति निजुरः। वृकस्य। त्राध्वम्। कर्त्तात्। अवपद इत्यवऽपदः। यजत्राः॥५१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि कूर्म है- निरन्तर क्रियाशील । क्रियाशीलता के कारण ही यह सबका धारण करनेवाला बनता है और स्वयं को शक्तिशाली बनाता है। यह सब देवों से प्रार्थना करता है - हे (यजत्राः) = यज्ञ के द्वारा त्राण करनेवाले देवो! (अद्य) = आज (अर्वाञ्चः) = हमारे समीप (भवत) = प्राप्त हानेवाले होओ। मनुष्य यज्ञशील होता है तो बुराइयों से बचा रहता है, जितना-जितना बुराइयों से दूर होता है, उतना उतना देवों के समीप होता है। २. जब मनुष्य संसार में इस दिव्यता के मार्ग को छोड़कर दूसरे मार्ग पर चलता है तब प्रारम्भ में कुछ चमक लगने पर भी पीछे अन्धकार-ही-अन्धकार दिखता है और यह 'कूर्म' देवों से कहता है कि मैं (भयमान:) = डरता हुआ-सा (हार्दि) = हृदय से (वः) = आपके प्रति (आ व्ययेयम्) = सर्वथा आता हूँ। देवशून्य संसार में आसुर राज्य चलता है और उसमें एक-से-एक बढ़कर बलवाले निर्बलों को समाप्त करते हुए चलते हैं। वहाँ घात ही घात दृष्टिगोचर होता है, कल्पना करके भी डर लगता है, इसीलिए इन असुरों से घबराकर मनुष्य फिर देवों की शरण में चलता है । ३. हे (देवाः) = देवो! (नः) = हमें (निजुर:) = निश्चय ही जीर्ण करनेवाली इस कामवासना से (त्राध्वम्) = बचाओ। (वृकस्य) = [वृक आदाने] इस आदान- ही आदान (लाला) की भावनावाली लोभवृत्ति से भी हमें बचाओं। ४. (कर्तात्) = अपने आधार को ही छिन्न-भिन्न करनेवाले इस क्रोध से (त्राध्वम्) = बचाओ और हे (यजत्राः) = यज्ञों के द्वारा त्राण करनवाले देवो! (अवपदः) = नीचे की ओर ले जानेवाले, अर्थात् पाँवों तले कुचलनेवाले इस अभिमान से भी (त्राध्वम्) = रक्षा कीजिए । अभिमान सदा पतनोन्मुख है pride goeth before a fall. इस अभिमान से आप हमारी रक्षा कीजिए। वस्तुतः कूर्म - क्रियाशील व्यक्ति ही काम, क्रोध व अभिमान पर विजय पा सकता है।
Essence
भावार्थ- हम अपने जीवन को प्राणसाधना से प्रारम्भ करें, इससे हममें स्वास्थ्य, प्रेम व ज्ञान की अग्नियाँ समिद्ध होंगी। ये हमें दिव्य बनाएँगी और हम जीवन के लिए आवश्यक धन का अर्जन करते हुए उसमें आसक्त न होंगे।
Subject
काम, क्रोध, लोभ व अभिमान का विजय