Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 50

97 Mantra
33/50
Devata- महेन्द्रो देवता Rishi- प्रगाथ ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्मे रु॒द्रा मे॒हना॒ पर्व॑तासो वृत्र॒हत्ये॒ भर॑हूतौ स॒जोषाः॑। यः शꣳस॑ते स्तुव॒ते धायि॑ प॒ज्रऽइन्द्र॑ज्येष्ठाऽअ॒स्माँ२ऽअ॑वन्तु दे॒वाः॥५०॥

अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। रु॒द्राः। मे॒हना॑। पर्व॑तासः। वृ॒त्र॒हत्य॒ इति॑ वृत्र॒ऽहत्ये॑। भर॑हूता॒विति॒ भर॑ऽहूतौ। स॒जोषा॒ इति॑ स॒ऽजोषाः॑ ॥ यः। शꣳस॑ते। स्तु॒व॒ते। धायि॑। प॒ज्रः। इन्द्र॑ज्येष्ठा॒ इतीन्द्र॑ऽज्येष्ठाः। अ॒स्मान्। अ॒व॒न्तु॒। दे॒वाः ॥५० ॥

Mantra without Swara
अस्मे रुद्रा मेहना पर्वतासो वृत्रहत्ये भरहूतौ सजोषाः । यः शँसते स्तुवते धायि पज्रऽइन्द्रज्येष्ठा अस्माँऽअवन्तु देवाः ॥

अस्मेऽइत्यस्मे। रुद्राः। मेहना। पर्वतासः। वृत्रहत्य इति वृत्रऽहत्ये। भरहूताविति भरऽहूतौ। सजोषा इति सऽजोषाः॥ यः। शꣳसते। स्तुवते। धायि। पज्रः। इन्द्रज्येष्ठा इतीन्द्रऽज्येष्ठाः। अस्मान्। अवन्तु। देवाः॥५०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अस्मे) = हममें (रुद्रा:) = रुद्र (मेहना) = [ धननाम-नि० ४.४] धन और (पर्वतास:) = शक्ति का पूरण हो । रुद्र तपस्या का प्रतीक है। रुद्र प्राण हैं। इनकी साधना करनेवाला भी रुद्र बनता है और शत्रुओं को रुलानेवाला होता है, परन्तु इस संसार में केवल तप से कार्य नहीं चलता । तपस्या यदि आत्मा व मन के बल को प्राप्त कराती है तो धन होने पर शरीर व मन दोनों सबल बन पाते हैं। दूसरे शब्दों में शक्तियों का पूरण तप व धन से साध्य हो जाता है । २. तप, धन व शक्ति का पूरण-ये (सजोषाः) = समानरूप से हमारा सेवन करनेवाले होकर (भरहूतौ) = संग्राम की पुकार होने पर (वृत्रहत्ये) = वृत्र के विनाश में निमित्त बनते हैं। यह वृत्र और इन्द्र का संग्राम ही अध्यात्म व सात्त्विक संग्राम है। इसमें विजय पाने के लिए आवश्यक है कि हम तपस्वी हों, शरीररक्षा के लिए पर्याप्त धनवाले हों और अपने में शक्ति का सञ्चय करें। ३. (यः पज्रः) = जो बल (शंसते स्तुवते) = शंसन व स्तवन करनेवाले के लिए होता है, वह बल हममें (धायि) = धारण किया जाए। हम किसी व्यक्ति की निन्दा न करें और प्रभु का सदा स्तवन करनेवाले बनें। ऐसा करने पर हमें बल की प्राप्ति होगी । (इन्द्रज्येष्ठाः) = इन्द्र है ज्येष्ठ जिनमें वे (देवा:) = सब देव (अस्मान् अवन्तु) = हमारी रक्षा करें। वस्तुतः सब देवों का रक्षण तभी प्राप्त होता है जब मनुष्य किसी की निन्दा नहीं करता और खाली समय को प्रभु-स्तवन में बिताता है। अपने समय को प्रभु-स्तवन में बितानेवाला यह व्यक्ति 'प्रगाथ' इस अन्वर्थक नामवाला है । प्रकृष्ट गायन करनेवाला । इस प्रभु-गायन से ही इसे वह शक्ति प्राप्त होती है जो इसे संग्राम में काम-क्रोधादि शत्रुओं का विनाश करने के योग्य बनाती है।
Essence
भावार्थ- हम तपस्वी बनें। धन को एकदम हेय न समझ लें। धनी बनकर तप को न छोड़ दें [विलासी न बन जाएँ] । यह मार्ग हमें वह शक्ति प्राप्त कराएगा जिससे हम वासना का विनाश कर पाएँगे।
Subject
तप+धन