Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 5

97 Mantra
33/5
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- स्वराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्वे विरू॑पे चरतः॒ स्वर्थे॑ऽअ॒न्यान्या॑ व॒त्समुप॑ धापयेते।हरि॑र॒न्यस्यां॒ भव॑ति स्व॒धावा॑ञ्छु॒क्रोऽअ॒न्यस्यां॑ दद्य्शे सु॒वर्चाः॑॥५॥

द्वेऽइति॑ द्वे। विरू॑पे॒ इति॒ विऽरू॑पे। च॒र॒तः॒। स्वर्थे॒ इति॑ सु॒ऽअर्थे॑। अ॒न्यान्येत्यन्याऽअ॑न्या। व॒त्सम्। उप॑। धा॒प॒ये॒ते॒ऽइति॑ धापयेते ॥ हरिः॑। अ॒न्यस्या॑म्। भव॑ति। स्व॒धावा॒निति॑ स्व॒धाऽवा॑न्। शु॒क्रः। अ॒न्यस्या॑म्। द॒दृ॒शे॒। सु॒वर्चा॒ इति॑ सु॒ऽवर्चाः॑ ॥५ ॥

Mantra without Swara
द्वे विरूपे चरतः स्वर्थेऽअन्यान्या वत्समुप धापयेते । हरिरन्यस्याम्भवति स्वधावाञ्छुक्रोऽअन्यस्यान्ददृशे सुवर्चाः ॥

द्वेऽइति द्वे। विरूपे इति विऽरूपे। चरतः। स्वर्थे इति सुऽअर्थे। अन्यान्येत्यन्याऽअन्या। वत्सम्। उप। धापयेतेऽइति धापयेते॥ हरिः। अन्यस्याम्। भवति। स्वधावानिति स्वधाऽवान्। शुक्रः। अन्यस्याम्। ददृशे। सुवर्चा इति सुऽवर्चाः॥५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ३१वें अध्याय की समाप्ति पर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ' इन शब्दों में कहा था कि 'धन व ज्ञान' वे दो तेरी पत्लियाँ हैं। इसी बात को 'यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च' इन शब्दों में दुहराया गया है [क्षत्रमिति धननाम - नि० २।१० ] । यहाँ 'ब्रह्म' ज्ञान का वाचक है और 'क्षत्र' धन का। ये दोनों ही मनुष्य के पालन करनेवाले हैं। यहाँ इनका पालक धात्रियों के रूप में चित्रण है। (द्वे) = ये 'श्री और लक्ष्मी' दोनों (विरूपे) = परस्पर भिन्न रूपवाली हैं-एक आन्तर है तो दूसरी बाह्य । अथवा ये दोनों ही विशिष्ट रूपवाली हैं। (चरतः) = [परिचरत:] ये दोनों इस प्रभुभक्त की परिचर्या सेवा करती है। मानव-जीवन के लिए धन व ज्ञान दोनों सहायक हैं। (स्वर्थे) = [सु अर्थ ] दोनों ही उत्तम प्रयोजनवाले हैं। (अन्यान्या) = दोनों अलग-अलग (वत्सम्) = उस प्रभु के प्रिय को अथवा अपने जीवन से प्रभु का प्रतिपादन करनेवाले को [वदति] उपधापयेते दूध पिलाती हैं, अर्थात् उसका पोषण करती हैं। २. इनमें से (अन्यस्याम्) = एक में तो यह (वत्स) = प्रभु का प्रिय पुत्र [क] (हरि:) = अपने दुःखों को दूर करनेवाला तथा [ख] (स्वधावान्) = अपना धारण करनेवाला भवति होता है, अर्थात् धन के द्वारा ये दुःखों को दूर करने के लिए आवश्यक वस्तुओं को जुटा पाता है, रोगादि होने पर औषधों के लिए धन का विनियोग करता है और अपने धारण के लिए आवश्यक भोजनादि सामग्री का संग्रह करने में समर्थ होता है। एवं प्रभुभक्त के लिए श्री के दो ही उपयोग हैं १. दु:ख दूर करने के लिए और २. धारण के लिए आवश्यक सामग्री का संग्रह। ३. (अन्यस्याम्) = दूसरी लक्ष्मीरूप धात्री में यह (शुक्रः) = ज्ञान की ज्योति से उज्ज्वल तथा (सुवर्चा:) = उत्तम वर्चस् व तेजवाला (ददृशे) = दिखता है। शुक्र शब्द 'शुच् दीप्तौ' धातु से बना है। ज्ञानाग्नि से यह दीप्त होता है, क्योंकि ज्ञानाग्नि इसके मलों को नष्ट कर देती है। ज्ञान से काम-क्रोध अथवा राग-द्वेषादि के मल भस्म कर दिये जाते हैं। वासनारूप मल के नष्ट होने पर यह भी परिणाम होता है कि यह भोगविलास में न फँसने से उत्तम तेजवाला बना रहता है। एवं, प्रभुभक्त में ज्ञान के भी दो परिणाम दिखते हैं १. नैर्मल्य के कारण दीप्ति, तथा २. विलास से दूर रहने के कारण विशिष्ट तेजस्विता । अपने ज्ञान से व ज्ञानजन्य तेजस्विता से सब शत्रुभूत वासनाओं को समाप्त करनेवाला यह वत्स - प्रभुभक्त 'कुत्स' कहलाता है [ कुथ हिंसायाम्] काम-क्रोधादि का हिंसन करनेवाला ।
Essence
भावार्थ-लक्ष्मी व श्रीरूप धात्रियों का दुग्धपान करके हम 'हरि, स्वाधावान्, शुक्र व सुवर्चा:' बनें। हम सब दुःखों से दूर हों, अपना धारण करने में समर्थ हों, देदीप्यमान व तेजस्वी हों।
Subject
धात्रीद्वय स्तन्यपान