Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 45

97 Mantra
33/45
Devata- इन्द्रवायू देवते Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒न्द्र॒वा॒यू बृह॒स्पतिं॑ मि॒त्राग्निं पू॒षणं॒ भग॑म्।आ॒दि॒त्यान् मारु॑तं ग॒णम्॥४५॥

इ॒न्द्र॒वा॒यूऽइती॑न्द्रवा॒यू। बृह॒स्पति॑म्। मि॒त्रा। अ॒ग्निम्। पू॒षण॑म्। भग॑म् ॥ आ॒दि॒त्यान्। मारु॑तम्। ग॒णम् ॥४५ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रवायू बृहस्पतिम्मित्राग्निम्पूषणम्भगम् । आदित्यान्मारुतङ्गणम् ॥

इन्द्रवायूऽइतीन्द्रवायू। बृहस्पतिम्। मित्रा। अग्निम्। पूषणम्। भगम्॥ आदित्यान्। मारुतम्। गणम्॥४५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की समाप्ति पर कहा था कि रात्रि व उषा के प्रारम्भ में प्रथम पुकार [प्रार्थना] के समय 'वायु व पूषा' को पुकारते हैं। उसी प्रार्थना को कुछ विस्तार से प्रस्तुत मन्त्र में करते हैं। 'मेधातिथि' प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है-जीवन-यात्रा में समझदारी से चलनेवाला। यह प्रातः सायं निम्न देवों का आराधन करता है १. (इन्द्रवायू) = मैं इन्द्र और वायु को पुकारता हूँ। 'इन्द्र', अर्थात् इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनूँ, ऐश्वर्यशाली बनूँ [इदि परमैश्वर्ये] मेरे कर्म शक्तिशाली हों [सर्वाणि बलकर्माणि इन्द्रस्य] वायु बनूँ [वा गतिगन्धनयोः], निरन्तर क्रियाशीलता के द्वारा बुराई का संहार करनेवाला बनूँ। ३. (बृहस्पतिम्) = बृहस्पति को पुकारता हूँ। बृहस्पति ऊर्ध्वा दिशा का अधिपति है। मैं भी उन्नति के शिखर पर पहुँचता हूँ। बृहस्पति देवगुरु हैं। मैं भी ज्ञानियों का गुरु, ज्ञानियों का भी ज्ञानी, उत्कृष्ट ज्ञानी बनता हूँ। ४. (मित्राग्निम्) = मित्र और अग्नि को पुकारता हूँ। [मित्रः प्रमीतेः त्रायते] अपने को मृत्यु व पाप से बचाता हूँ और इस प्रकार आगे बढ़ता हूँ [ अग्निः अग्रेणी: ] । मित्र शब्द की भावना [मिद् स्नेहने] स्नेह करने की भी है। उन्नति-पथ वस्तुतः प्रेम-पथ ही है । ५. (पूषणं भगम्) = मैं पूषा व भग को पुकारता हूँ। अपना पोषण करके औरों के भी पोषण के लिए प्रयत्नशील होता हूँ। पोषण के लिए भग [ऐश्वर्य] को बाँटता हूँ। पोषण के लिए पर्याप्त धन से अधिक धन की कामना नहीं करता हूँ। ६. (आदित्यान्) = मैं आदित्यों को पुकारता हूँ। 'आदानात् आदित्यः' आदित्य वे हैं जो अपनी 'मैं' में सभी को समाविष्ट कर लेते हैं। उदार हृदय बनकर मैं वसुधा को कुटुम्ब समझने का प्रयत्न करता हूँ। इस हृदय की विशालता के लिए ही ७. (मारुतं गणम्) = प्राणसमूह को पुकारता हूँ। वस्तुतः प्राणसाधना से ही हृदय निर्दोष व विशाल बनेगा।
Essence
भावार्थ- मैं प्राणसाधना के द्वारा इन्द्र, वायु, बृहस्पति, मित्र, अग्नि, पूषन्, भग व आदित्य को अपने अन्दर धारण करता हूँ।
Subject
दिव्य गुणों का आराधन