Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 44

97 Mantra
33/44
Devata- वायुर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र वा॑वृजे सुप्र॒या ब॒र्हिरे॑षा॒मा वि॒श्पती॑व॒ बीरि॑टऽइयाते।वि॒शाम॒क्तोरु॒षसः॑ पू॒र्वहू॑तौ वा॒युः पू॒षा स्व॒स्तये॑ नि॒युत्वा॑न्॥४४॥

प्र। वा॒वृ॒जे। व॒वृ॒जे॒ऽइति॑ ववृजे। सु॒ऽप्र॒या इति॑ सुप्र॒याः। ब॒र्हिः। ए॒षा॒म्। आ। वि॒श्पती॑व। वि॒श्पती॒वेति॑ वि॒श्पती॑ऽइव। बीरि॑टे। इ॒या॒ते॒ ॥ वि॒शाम्। अ॒क्तोः। उ॒षसः॑। पू॒र्वहू॑ता॒विति॑ पू॒र्वऽहू॑तौ। वा॒युः। पू॒षा। स्व॒स्तये॑। नि॒युत्वा॑न् ॥४४ ॥

Mantra without Swara
प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विश्पतीव बीरिटऽइयाते । विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान् ॥

प्र। वावृजे। ववृजेऽइति ववृजे। सुऽप्रया इति सुप्रयाः। बर्हिः। एषाम्। आ। विश्पतीव। विश्पतीवेति विश्पतीऽइव। बीरिटे। इयाते॥ विशाम्। अक्तोः। उषसः। पूर्वहूताविति पूर्वऽहूतौ। वायुः। पूषा। स्वस्तये। नियुत्वान्॥४४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि वसिष्ठ है, उत्तम निवासवाला। इसके जीवन की निम्न बातें ध्यान देने योग्य हैं - १. (प्रवावृजे) = यह वासनाओं का स्वयं ही वर्जन करता है, काम-क्रोध आदि का अपने को शिकार नहीं होने देता। २. (सुप्रया) = इस उद्देश्य से यह सात्त्विक अन्नवाला होता है, अथवा उत्तम प्रयत्नवाला होता है [ प्रयस् अन्न, प्रयत्न ] ३. (एषां बर्हिः) = इसी से इनका हृदय बर्हि बनता है, जिसमें से वासनाओं का उद्बर्हण कर दिया गया है तथा जो अत्यन्त बृंहित = बढ़ा हुआ, विशाल बना है। ४. (आविश्पती इव) = यह समन्तात् प्रजाओं का रक्षक-सा बनता है। विशाल व निर्वासन हृदयवाला बनकर यह सभी का हित साधन करता है। ५. ऐसे अच्छे, आकर्षक [आकृष्णेन रोचनम् ] ढंग से प्रचार करता है कि यह (विशाम्) = प्रजाओं के (बीरिटे) = हृदयान्तरिक्ष में (इयाते) = पहुँच जाता है [Touches their heart], उनको अपनी बात अच्छी प्रकार हृदयंगम करा देता है। ४. (अक्तोः) = रात्रि के तथा (उषसः) = उषाकाल के (पूर्वहूतौ) = प्रथम पुकार में, अर्थात् सायं व प्रातः की प्रार्थना में यह आराधना करता हुआ कहता है कि मैं [क] (वायुः) = वायु की भाँति सदा गतिशील बनूँ, (पूषा) = सूर्य की भाँति सब प्रजाओं में प्राण का सञ्चार करूँ [ग] (नियुत्वान्) = 'नियुत्' शब्द वायु के घोड़ों के लिए प्रयुक्त होता है। जीवात्मा 'वायु' है ('वायुरनिलममृतम्')। इन्द्रियाँ उसके घोड़े हैं। मैं उत्तम इन्द्रियरूप अश्वोंवाला बनूँ। यह उत्तम इन्द्रियाँश्वोंवाला ही अपनी जीवन-यात्रा उत्तम ढंग से पूर्ण कर पाता है। इसप्रकार मैं (स्वस्तये) = उत्तम स्थिति के लिए होऊँ । मेरा कल्याण हो, मैं औरों का कल्याण करनेवाला बनूँ ।
Essence
भावार्थ- मेरा जीवन निर्वासन [वासनारहित], सात्त्विक व पवित्र हृदयवाला हो। मैं लोकसंग्रह करता हुआ लोगों के हृदयों तक पहुँचने का प्रयत्न करूँ। प्रात : - सायं यही आराधना करूँ कि मैं क्रियाशील, पोषण करनेवाला व उत्तम इन्द्रियोंवाला बनकर उत्तम स्थिति में होऊँ।
Subject
वसिष्ठ- उत्तम जीवन