Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 38

97 Mantra
33/38
Devata- सूर्यो देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्याभि॒चक्षे॒ सूर्य्यो॑ रू॒पं कृ॑णुते॒ द्योरु॒पस्थे॑। अ॒न॒न्तम॒न्यद्रुश॑दस्य॒ पाजः॑ कृ॒ष्णम॒न्यद्ध॒रितः॒ सं भ॑रन्ति॥३८॥

तत्। मि॒त्रस्य॑। वरु॑णस्य। अ॒भि॒चक्ष॒ऽइत्य॑भि॒चक्षे॑। सूर्य्यः॑। रू॒पम्। कृ॒णु॒ते॒। द्योः। उ॒पस्थ॒ऽइत्यु॒पस्थे॑ ॥ अ॒न॒न्तम्। अ॒न्यत्। रुश॑त्। अ॒स्य॒। पाजः॑। कृ॒ष्णम्। अ॒न्यत्। ह॒रितः॑। सम्। भ॒र॒न्ति॒ ॥३८ ॥

Mantra without Swara
तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्या रूपङ्कृणुते द्योरुपस्थे । अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सम्भरन्ति ॥

तत्। मित्रस्य। वरुणस्य। अभिचक्षऽइत्यभिचक्षे। सूर्य्यः। रूपम्। कृणुते। द्योः। उपस्थऽइत्युपस्थे॥ अनन्तम्। अन्यत्। रुशत्। अस्य। पाजः। कृष्णम्। अन्यत्। हरितः। सम्। भरन्ति॥३८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सूर्य:) = ज्ञान- सूर्य को अपने अन्दर उदित करनेवाला यह व्यक्ति (द्यो:) = उस प्रकाशमय प्रभु के (उपस्थे) = समीप, उसकी गोद में बैठता हुआ मित्रस्य स्नेह की भावना को तथा (वरुणस्य) = द्वेष- निवारण की भावना को (अभिचक्षे) = एकत्व दर्शन के लिए (तत् रूपम्) = प्रकाश को अपने अन्दर (कृणुते) = करता है। [रूपम् - प्रज्ञानम् - नि० १०।१३] । ज्ञान का प्रथम परिणाम ही यह है कि मनुष्य द्वेष से ऊपर उठता है और स्नेह से वर्त्तता है। २. अस्य ज्ञान के सूर्य से देदीप्यमान इस पुरुष का (पाजः) = बल (अनन्तम्) = बहुत अधिक होता है। (अन्यत्) = विलक्षण होता है और (रुशत्) = देदीप्यमान होता है। वस्तुतः प्रभु के सम्पर्क के कारण इसमें प्रभु की ही शक्ति काम करने लगती है, अतः इसकी शक्ति का असाधारण व विलक्षण प्रतीत होना स्वाभाविक ही है । ३. (हरितः) = इसकी ये ज्ञानरश्मियाँ [इस सूर्य के ये अश्व] (अन्यत्) = एक विलक्षण ही (कृष्णम्) = 'कृषिर्भूवाचक: शब्द, णश्च निर्वृतिवाचक:' भू और निर्वृति, स्वास्थ्य और सन्तोष को (संभरन्ति) = सबके अन्दर भरती हैं। सूर्योदय होता है और उसकी किरणें सबमें प्राणशक्ति का सञ्चार करती हैं, इसीप्रकार इस कुत्स की जो ज्ञान का सूर्य बन गया है, ज्ञानकिरणें सभी को स्वास्थ्य व सन्तोष देनेवाली होती हैं। 'कृष्णम्' शब्द का अर्थ आकर्षण भी है। इसकी ये ज्ञानकिरणें बड़े आकर्षक ढंग से लोगों में ज्ञान भरती हैं। यही भावना ३६वें मन्त्र में 'रोचनम्' शब्द से कही गई थी।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु का उपस्थान करते हुए ज्ञान प्राप्त करें और सभी के साथ स्नेह करनेवाले बनें। तेजस्वी बनें और औरों को भी ज्ञान देनेवाले बनें।
Subject
स्वास्थ्य व सन्तोष