Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 31

97 Mantra
33/31
Devata- सूर्यो देवता Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑।दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य्य॑म्॥३१॥

उँ॒ऽइत्युँ॑त्। उ। त्यम्। जा॒तवे॑दस॒मिति॑ जा॒तऽवे॑दसम्। दे॒वम्। व॒ह॒न्ति॒। के॒तवः॑ ॥ दृ॒शे। विश्वा॑य। सूर्य्य॑म् ॥३१ ॥

Mantra without Swara
उदु त्यञ्जातवेदसन्देवँ वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥

उँऽइत्युँत्। उ। त्यम्। जातवेदसमिति जातऽवेदसम्। देवम्। वहन्ति। केतवः॥ दृशे। विश्वाय। सूर्य्यम्॥३१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र का 'विराट्' यहाँ 'प्रस्कण्व' ' अत्यन्त मेधावी' इस नाम से कहा गया है। यह १. उत्- निश्चय से प्रकृति से ऊपर उठता है । (उत्) = out। यह प्रकृति के अन्दर उलझा नहीं रहता। २. प्रकृति से ऊपर उठकर (केतवः) = ये ज्ञानी लोग (त्यम्) = उस अव्यक्त प्रभु को जो (जातवेदसम्) = सर्वज्ञ व सर्वव्यापक [जाते विद्यते] हैं तथा (देवम्) = दिव्य गुणों के पुञ्ज हैं और (सूर्यम्) = सदा हृदयस्थरूपेण उत्तम कर्मों की प्रेरणा दे रहे हैं [सुवति], उस प्रभु को ये विराट् व प्रस्कण्व लोग (वहन्ति) = धारण करते हैं। जैसे शरीर में प्राणों के संयम से ज्ञान- सूर्य का उदय होता है, जैसे सूर्य में मन का संयम करने से सम्पूर्ण भुवन का ज्ञान होता है, उसी प्रकार उस सूर्यरूप प्रभु का धारण करने से सम्पूर्ण देवों का ज्ञान हुआ करता है । २. (दृशे विश्वाय) = सम्पूर्ण विश्व का दर्शन करने के लिए ये ज्ञानी लोग प्रभु का धारण करते हैं। वस्तुतः प्रभु के ज्ञान में सब विज्ञान समा जाते हैं।
Essence
भावार्थ- हम प्रकृति से ऊपर उठें, प्रभु को धारण करें, जिससे विश्व का दर्शन कर पाएँ।
Subject
विश्व-दर्शन