Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 30

97 Mantra
33/30
Devata- सूर्यो देवता Rishi- विभ्राड् ऋषिः Chhand- विराट् जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि॒भ्राड् बृ॒हत् पि॑बतु सो॒म्यं मध्वायु॒र्दध॑द् य॒ज्ञप॑ता॒ववि॑ह्रुतम्।वात॑जूतो॒ योऽअ॑भि॒रक्ष॑ति॒ त्मना॑ प्र॒जाः पु॑पोष पुरु॒धा वि रा॑जति॥३०॥

वि॒भ्राडिति॑ वि॒ऽभ्राट्। बृ॒हत्। पि॒ब॒तु॒। सो॒म्यम्। मधु॑। आयुः॑। दध॑त्। य॒ज्ञप॑ता॒विति॑ य॒ज्ञऽप॑तौ। अवि॑ह्रुत॒मित्यवि॑ऽह्रुतम् ॥ वात॑जूत॒ इति॒ वात॑ऽजूतः। यः। अ॒भि॒रक्ष॒तीत्य॑भि॒ऽरक्ष॑ति। त्मना॑। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। पु॒पो॒ष॒। पु॒रु॒धा। वि। रा॒ज॒ति॒ ॥३० ॥

Mantra without Swara
विभ्राड्बृहत्पिबतु सोम्यम्मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम् । वातजूतो योऽअभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति ॥

विभ्राडिति विऽभ्राट्। बृहत्। पिबतु। सोम्यम्। मधु। आयुः। दधत्। यज्ञपताविति यज्ञऽपतौ। अविह्रुतमित्यविऽह्रुतम्॥ वातजूत इति वातऽजूतः। यः। अभिरक्षतीत्यभिऽरक्षति। त्मना। प्रजा इति प्रऽजाः। पुपोष। पुरुधा। वि। राजति॥३०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में वेदवाणी को अपने में भरने का वर्णन था। यह पुरुष (विभ्राट्) = विशिष्ट ज्ञान की दीप्ति से चमकता है [वि- भ्राज्] और इसका हृदय (बृहत्) = विशाल बनता है। 'विज्ञानमयकोश ज्ञान से जगमगाता हो और मनोमयकोश राग-द्वेष से ऊपर उठकर विशाल बन गया हो' तो वह जीवन कितना सुन्दर होगा ! २. इन दोनों कार्यों के लिए यह (सोम्यम् मधु) = सोम - वीर्यरूप मधुरतम वस्तु का पिबतु पान करे। इस सोम की रक्षा से ही ज्ञानाग्नि दीप्त होती है और हृदय संकुचित भावनाओं से ऊपर उठता है। यह ज्ञान के सूर्य से चमकनेवाला विशाल हृदय पुरुष ३. (आयुः) = अपने सम्पूर्ण जीवन को, जिसको इसने ('अविहृतम्') = अकुटिल बनाया है (यज्ञपतौ) = यज्ञों के पति प्रभु में (दधत्) = धारण करता है। अपने सम्पूर्ण जीवन को प्रभु अर्पण करता है। जब हम इस समर्पण की भावना से चलेंगे तब जीवन को अधिक-से-अधिक सरल बनाएँगे ही। ('आर्जवं ब्रह्मणः पदम्') = सरलता ही ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग है। ४. समर्पण के लिए यह (वातजूतः) = वायु से प्रेरणा प्राप्त करता हुआ, वायु की भाँति सरलता से कार्य करता है, वायु की भाँति औरों को जीवन देनेवाला होता है। शरीर में वायु के पुञ्ज प्राणों की साधना करता हुआ (यः) = यह (त्मना) = स्वयं (अभिरक्षति) = चारों ओर से अपनी रक्षा करता है, अर्थात् वासनाओं से अपने को बचाता है। प्राणसाधना से सब इन्द्रिय-दोषों का दहन हो जाता है। ५. यह (प्रजाः पुपोष) = उत्तम सन्तानों का पोषण करता है अथवा प्रजाओं का पालन करता है और (पुरुधा) = बहुत प्रकार से (विराजति) = विशेषरूप से चमकता है। [क] ज्ञान के सूर्य से चमकता हो [विभ्राट्], [ख] मन की विशालता से शोभायमान हो [बृहत्], [ग] सोम्य मधु का पानकर यह नीरोग बनकर स्वास्थ्य की ज्योति से चमकता है। [घ] प्रभु के प्रति समर्पण से यह निराभिमानता के कारण सुशोभित हुआ, [ङ] प्राणसाधना से वासनाओं पर विजय से यह अलंकृत हुआ। [च] प्रजाओं के पोषण के कारण यह यश से उज्ज्वल हो उठा। एवं सतत् उज्ज्वल होकर यह सचमुच 'विराट्' इस अन्वर्थक नामवाला बना ।
Essence
भावार्थ- हम 'विराट्' = सर्वत्र दीप्तिवाले बनें।
Subject
ज्ञान-सूर्य