Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 28

97 Mantra
33/28
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- गौरिवीतिर्ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ तत्त॑ऽइन्द्रा॒यवः॑ पनन्ता॒भि यऽऊ॒र्वं गोम॑न्तं॒ तितृ॑त्सान्।स॒कृ॒त्स्वं] ये पु॑रुपु॒त्रां म॒ही स॒हस्र॑धारां बृह॒तीं दुदु॑क्षन्॥२८॥

आ। तत्। ते॒। इ॒न्द्र॒। आ॒यवः॑। प॒न॒न्त॒। अ॒भि। ये। ऊ॒र्वम्। गोम॑न्त॒मिति॒ गोऽम॑न्तम्। तितृ॑त्सान् ॥ स॒कृ॒त्स्व᳕मिति॑ सकृ॒त्ऽस्व᳕म्। ये। पु॒रु॒पु॒त्रामिति॑ पुरुपु॒त्राम्। म॒हीम्। स॒हस्र॑धारा॒मिति॑ स॒हस्र॑ऽधाराम्। बृ॒ह॒तीम्। दुदु॑क्षन्। दुधु॑क्ष॒न्निति॒ दुधु॑क्षन् ॥२८ ॥

Mantra without Swara
आ तत्तऽइन्द्रायवः पनन्ताभि यऽऊर्वङ्गोमन्तन्तितृत्सान् । सकृत्स्वँये पुरुपुत्राम्महीँ सहस्रधाराम्बृहतीन्दुदुक्षन् ॥

आ। तत्। ते। इन्द्र। आयवः। पनन्त। अभि। ये। ऊर्वम्। गोमन्तमिति गोऽमन्तम्। तितृत्सान्॥ सकृत्स्वमिति सकृत्ऽस्वम्। ये। पुरुपुत्रामिति पुरुपुत्राम्। महीम्। सहस्रधारामिति सहस्रऽधाराम्। बृहतीम्। दुदुक्षन्। दुधुक्षन्निति दुधुक्षन्॥२८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
'इन्द्र' शब्द का अर्थ राजा भी होता है, तो प्रसंगवश २६ व २७वें मन्त्र में राजा का उल्लेख करके फिर आत्मा के विषय में कहते हैं कि १. हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन्, परमैश्वर्यशाली प्रभो! (आयवः) = गतिशील ते वे मनुष्य (तत्) = तेरा आपनन्त सर्वथा स्तवन करते हैं (ये) = जो (गोमन्तं ऊर्वम्) = इस इन्द्रियों के समूह को (अभि) = लक्ष्य करके (तितृत्सान्) = हिंसित करते हैं, अर्थात् जो इन्द्रियों को मार लेते हैं, वश में कर लेते हैं। इन्द्रियों को जीतना और प्रभु का स्तवन करना, इन दोनों बातों में भेद नहीं है। प्रभु इन्द्र हैं, हम भी (इन्द्र) = जितेन्द्रिय बनकर उस इन्द्र का स्तवन कर पाएँगे। २. हे प्रभो! आपकी स्तुति वे करते है जो (बृहतीम्) = वेदवाणी को सर्वप्रकार की उन्नतियों के साधनभूत वेद को (दुदुक्षन्) = दोहते हैं। किस वेदवाणी को ? [क] (सकृत्स्वम्) = एक ही बार जन्म देनेवाली को, या दूसरे शब्दों में पुर्नजन्म को रोकनेवाली को। इस वेदवाणी से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य बार-बार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। [ख] (पुरुपुत्राम्) = यह वेदवाणी पालन व पूरण के द्वारा [पृ] पवित्र करती है [पू] और इस प्रकार मनुष्य की रक्षा करनेवाली होती है [त्र] । [ग] (महीम्) = यह महनीय है। इसका अध्येता भी महान् हो जाता है। [घ] (सहस्रधाराम्) = सहस्रों प्रकार से धारण करनेवाली है। सब प्राकृतिक पदार्थों का ज्ञान देकर यह हमारा धारण करती है। इस वाणी के अध्ययन से 'आयु, प्राण, प्रजा, पशु व कीर्ति - सभी कुछ जीव को मिलता है। ३. इस वेद का दोहन करनेवाले को 'गौरीवीति' = सात्त्विक भोजनवाला तो होना ही चाहिए।
Essence
भावार्थ- प्रभु की उपासना 'जितेन्द्रियता' व 'वेद दोहन' से हुआ करती है।
Subject
जितेन्द्रियता व वेद-दोहन