Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 2

97 Mantra
33/2
Devata- अग्नयो देवताः Rishi- विश्वरूप ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हर॑यो धू॒मके॑तवो॒ वात॑जूता॒ऽउप॒ द्यवि॑।यत॑न्ते॒ वृथ॑ग॒ग्नयः॑॥२॥

हर॑यः। धू॒मके॑तव॒ इति॑ धू॒मऽके॑तवः। वात॑जूता॒ इति वात॑ऽजूताः। उप॑। द्यवि॑ ॥ यत॑न्ते। वृथ॑क्। अ॒ग्नयः॑ ॥२ ॥

Mantra without Swara
हरयो धुमकेतवो वातजूताऽउप द्यवि । यतन्ते वृथगग्नयः ॥

हरयः। धूमकेतव इति धूमऽकेतवः। वातजूता इति वातऽजूताः। उप। द्यवि॥ यतन्ते। वृथक्। अग्नयः॥२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र - वर्णित प्रभुभक्त (हरयः) = औरों के दुःखों को हरण करनेवाले होते हैं। वस्तुतः ये औरों के दुःखों को अपना बना लेते हैं और उसे दूर किये बिना शान्ति अनुभव नहीं करते। २. (धूमकेतवः) = [धूम-वासनाओं को कम्पित करना, केतु-ज्ञानवाला] इनका ज्ञान वासनाओं को दूर करनेवाला होता है। इस ज्ञान को देकर वासना - विनाश के द्वारा ये लोगों को दुःखों से ऊपर उठाते हैं। ३. (वातजूता:) = अपने इस ज्ञान प्रसार के कार्य में ये वायु से प्रेरित होते हैं। वायु से प्रेरणा प्राप्त करके ये निरन्तर ज्ञान प्रसाररूप कार्य में लगे रहते हैं। ४. जिनका ये हित कर रहे हैं वे लोग सम्भवत: इनके कृतज्ञ न होकर इनका अपमान भी कर दें, परन्तु ये तो (वृथक्) = वृथा ही, अर्थात् किसी भी प्रकार की फलाशा को न लेकर (उपद्यवि) = उस द्योतनात्मक प्रभु के चरणों में स्थित हुए हुए (यतन्ते) = उद्योग में लगे रहते हैं। यह 'सर्वभूतहित में लगना ही तो सच्ची प्रभुभक्ति है. और अन्ततः ५. (अग्नयः) = 'अग्रेणी:' औरों को भी आगे ले चलनेवाले होते हैं। स्वयं अग्नि बनकर ये औरों को भी अग्नि बना पाते हैं। लोकहित में लगे हुए ये सबमें अपने को ही देखते हैं और इस कारण 'विश्वरूप' हो जाते हैं, सभी के सुख में ये सुख का अनुभव करते हैं।
Essence
भावार्थ- हम स्वयं अग्नि बनकर औरों को भी अग्नि बनाने का प्रयत्न करें।
Subject
प्रभुभक्त=धूमकेतु