Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 14

97 Mantra
33/14
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त्वेऽअ॑ग्ने स्वाहुत प्रि॒यासः॑ सन्तु सू॒रयः॑।य॒न्तारो॒ ये म॒घवा॑नो॒ जना॑नामू॒र्वान् दय॑न्त॒ गोना॒म्॥१४॥

त्वेऽइति॒ त्वे। अ॒ग्ने॒। स्वा॒हु॒तेति॑ सुऽआहुत। प्रि॒यासः॑। स॒न्तुः॒। सू॒रयः॑ ॥ य॒न्तारः॑ ये। म॒घवा॑न॒ इति॑ म॒घऽवा॑नः। जना॑नाम्। ऊ॒र्वान्। दय॑न्त। गोना॑म् ॥१४ ॥

Mantra without Swara
त्वेऽअग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः । यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वान्दयन्त गोनाम् ॥

त्वेऽइति त्वे। अग्ने। स्वाहुतेति सुऽआहुत। प्रियासः। सन्तुः। सूरयः॥ यन्तारः ये। मघवान इति मघऽवानः। जनानाम्। ऊर्वान्। दयन्त। गोनाम्॥१४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) = सबके अग्रणी - सबको उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले प्रभो! (स्वाहुत) [सु आ हुत]=अत्यन्त उत्तमता से सब ओर, सब-कुछ देनेवाले प्रभो! (त्वे) = आपके (प्रियासः) = प्रिय (सन्तु) = हों। कौन ? १. (सूरयः) = जो विद्वान् हैं। ज्ञानी पुरुष ही प्रभु को प्रिय है। ('ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्') = ज्ञानी तो मुझे आत्मतुल्य प्रिय है । २. (यन्तारः) = जो इस शरीररूप रथ के उत्तम सारथि बनते हैं। जो इन्द्रियरूप घोड़ों को मनरूप लगाम से काबू करने में कुशल हैं। ३. (ये) = जो (जनानाम्) = लोगों में (मघवान:) = उस ऐश्वर्यवाले हैं, जिसमें [मा अघ] पाप का लवलेश भी नहीं । या [मघ-मख] जो लोगों में यज्ञिय प्रवृत्तिवाले हैं। यज्ञमय जीवन बनाकर जो सदा अमृत का सेवन करते हैं तथा अन्त में ४. (गोनाम्) = [गाव इन्द्रियाणि] इन्द्रियों की (ऊर्वान्) = हिंसाओं को (दयन्त) = हिंसित करते हैं। काम सर्वप्रथम इन इन्द्रियों को अपना शिकार बनाता है, तभी यह 'पञ्चबाण' है। इसका एक-एक बाण एक-एक इन्द्रिय पर आक्रमण करता है। जो व्यक्ति इन्द्रियों के 'हिंसक काम को अपनी ज्ञानाग्नि से भस्म कर पाते हैं, वे ही प्रभु के प्रिय बनते हैं। जब मन्त्रार्थ 'राज' परक होता है तब अर्थ यह होता है कि 'जो गोहिंसकों के हिंसक होते हैं वे मुझे प्रिय हैं। राजा ने ('यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम् । तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोऽसोऽवीरहा') = गौ, अश्व व पुरुषों के हिंसकों से राष्ट्र की रक्षा करनी है। अपने जीवन पर पूर्ण नियमन करनेवाला 'यन्ता' ही 'वसिष्ठ' है, वशियों में श्रेष्ठ व उत्तम निवासवाला है। यह 'वसिष्ठ' ही प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है।
Essence
भावार्थ- हम 'सूरि, यन्ता, मघवा व इन्द्रियों की रक्षा करनेवाले' बनकर प्रभु के प्रिय बनें।
Subject
प्रभु के प्रिय कौन?