Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 10

97 Mantra
33/10
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- विराड् गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
विश्वे॑भिः सो॒म्यं मध्वग्न॒ऽइन्द्रे॑ण वा॒युना॑।पिबा॑ मि॒त्रस्य॒ धाम॑भिः॥१०॥

विश्वे॑भिः। सो॒म्यम्। मधु॑। अग्ने॑। इन्द्रे॑ण। वा॒युना॑ ॥ पिब॑। मि॒त्रस्य॑। धाम॑भि॒रिति॒ धाम॑ऽभिः ॥१० ॥

Mantra without Swara
विश्वेभिः सोम्यम्मध्वग्नऽइन्द्रेण वायुना । पिबा मित्रस्य धामभिः ॥

विश्वेभिः। सोम्यम्। मधु। अग्ने। इन्द्रेण। वायुना॥ पिब। मित्रस्य। धामभिरिति धामऽभिः॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (अग्ने) = [अगि गतौ] निरन्तर प्रभु की ओर चलनेवाले । उन्नतिपथ पर आगे बढ़नेवाले जीव! तू (मित्रस्य) = अपने मित्र प्रभु के (धामभिः) = तेजों के उद्देश्य से (सोम्यम् मधु) = सौम्य मधु को (इन्द्रेण) = इन्द्र से, अर्थात् इन्द्र बनकर और (वायुना) = वायु से अर्थात् प्राणों की साधना से (पिब) = पान कर। २. गतमन्त्र में ' भरद्वाज' ने प्रभु को समिद्ध किया, उसकी ओर चला और अन्त में उसके प्रति अपना अर्पण किया, इस प्रकार वह प्रभु का 'सयुज-सखा'-साथ रहनेवाला मित्र बन गया। 'इस मित्र के तेजों को यह भारद्वाज भी प्राप्त करना चाहे' यह स्वाभाविक ही है। प्रभुभक्त प्रभु जैसा क्यों न बने ? ३. इन तेजों को प्राप्त करने के लिए ही मन्त्र में 'सोम्य मधु' के पान का उल्लेख [विधान] है। वीर्यशक्ति [semen] ही सोम है। यह अन्न का सारभूत होने से मधु कहा गया है। मधु [शहद] भी पुष्परसों का सार होता है। यह शक्ति शरीर में सुरक्षित होने पर मनुष्य को 'सौम्य' बनाती है तथा उसकी ज्ञानाग्नि को दीप्त करके उसे [स+उमा] ब्रह्मज्ञानसहित करती है, इसी से इसका नाम 'सौम्य' पड़ गया है । ४. इस सोम का पान करने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य 'इन्द्र' बने, जितेन्द्रिय हो । इन्द्रियों का अधिष्ठाता इन्द्र ही सोम का पान करता है । ५. इन इन्द्रियों के वशीकरण व निर्दोषता के लिए प्राणों की साधना अत्यन्त उपयोगी है। वायुना प्राणों के द्वारा, प्राणायाम से ही इन्द्रियों के मल नष्ट होते हैं। साथ ही इस प्राणसाधना से वीर्य की ऊर्ध्वगति भी सिद्ध होती है और मनुष्य ऊर्ध्वरेतस् बन पाता है। यह रेतस् ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और यह साधक दीप्त बुद्धि को प्राप्त करके 'मेधातिथि' बन जाता है, निरन्तर मेधा की ओर चलनेवाला ।
Essence
भावार्थ- हम जितेन्द्रियता व प्राणसाधना के द्वारा 'सोम्य मधु' [वीर्य] का पान करनेवाले बनें, जिससे अपने मित्र उस प्रभु के तेजों से तेजस्वी बन सकें।
Subject
सौम्य मधु का पान