Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 1

97 Mantra
33/1
Devata- अग्नयो देवताः Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- स्वराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्याजरा॑सो द॒माम॒रित्रा॑ऽअ॒र्चद्धू॑मासोऽअ॒ग्नयः॑पाव॒काः।श्वि॒ती॒चयः॑ श्वा॒त्रा॒सो॑ भुर॒ण्यवो॑ वन॒र्षदो॑ वा॒यवो॒ न सोमाः॑॥१॥

अ॒स्य। अ॒जरा॑सः। द॒माम्। अ॒रित्राः॑। अ॒र्चद्धू॑मास॒ इत्य॒र्चत्ऽधू॑मासः। अ॒ग्नयः॑। पा॒व॒काः ॥ श्वि॒ती॒चयः॑। श्वात्रासः॑। भु॒र॒ण्यवः॑। व॒न॒र्षदः॑। व॒न॒सद॒ इति॑ वन॒ऽसदः॑। वा॒यवः॑। न। सोमाः॑ ॥१ ॥

Mantra without Swara
अस्याजरासो दमामरित्राऽअर्चद्धूमासोऽअग्नयः पावकाः । श्वितीचयः श्वात्रासो भुरण्यवो वनर्षदो वायवो न सोमाः ॥

अस्य। अजरासः। दमाम्। अरित्राः। अर्चद्धूमास इत्यर्चत्ऽधूमासः। अग्नयः। पावकाः॥ श्वितीचयः। श्वात्रासः। भुरण्यवः। वनर्षदः। वनसद इति वनऽसदः। वायवः। न। सोमाः॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अस्य) = इस प्रभु के भक्त (अजरासः) = जीर्ण नहीं होते। मनुष्य जब प्रकृति की ओर झुकता है तब भोगप्रवण होकर क्षीण होने लगता है। प्रभुभक्त प्रकृति में न फँसकर अक्षीण बना रहता है। २. ये प्रभुभक्त अक्षीण इसलिए बने रहते हैं कि ये (दमाम्) = दमन करनेवाली वासनाओं में से (अरित्राः) = शत्रुभूत वासनाओं से अपना त्राण करते हैं। काम-क्रोधादि वासनाएँ मनुष्य की शत्रुभूत हैं, उनसे यह प्रभुभक्त अपने को बचाता है, अतएव अक्षीण बना रहता है। ३. इन शत्रुभूत वासनाओं से ये अपने को इसलिए बचा पाते हैं कि ये अर्चत् प्रभु की अर्चना करनेवाले होते हैं और इस प्रकार (धूमासः) = वासनाओं को प्रकम्पित करके दूर भगा देते हैं [अर्चन्तः धूमासः, धूञ् कम्पने] । ४. वासनाओं को कम्पित करके ये अग्नयःअग्नि बनते हैं, आगे बढ़ते हैं । ५. इस प्रकार उन्नति पथ पर आगे बढ़ते हुए ये अपने को (पावकाः) = पवित्र कर लेते हैं। भटकने से ही अपवित्रता आती है। न ये भटकते हैं, न अपवित्र होते हैं। ६. (श्वितीचयः) = 'श्वितिं चिन्वन्ति' = ये शुद्धता का सञ्चय करते हैं अथवा 'श्विति अञ्चन्ति = शुक्लमार्ग से ही गति करते हैं। निष्कामता से यज्ञों को करना ही शुक्ल मार्ग है। इस मार्ग पर चलते हुए ये ७. (श्वात्रासः) = कल्याणवाले होते हैं अथवा उस ज्ञानरूप धनवाले होते हैं जो 'शिव' = वृद्धि का हेतु व 'त्र' त्राण-रक्षण का कारण बनता है। ८. इस प्रकार वैयक्तिक जीवन को उल्लिखित सप्त रत्नों से भरकर ये (भुरण्यवः) = सब लोगों का भरण करनेवाले बनते हैं। ९. (वनर्षद:) = [ वन्= worshipping, a ray of light] अपने खाली समय को ये पूजा में या ज्ञान प्राप्ति में व्यय करते हैं [वन्-पूजा या ज्ञानप्राप्ति, सद्-बैठना ] । १०. (वायवः न) = ये वायुओं के समान सदा गतिशील होते हैं और वायु की भाँति ही ये प्रजा में प्राण का सञ्चार करते हैं। ११. इस स्थिति में स्वाभाविक है कि लोगों से इन्हें मान व पूजा प्राप्त हो, परन्तु इन्हें चाहिए कि उस पूजा से अपने मस्तिष्क को विकृत न होने दें और (सोमाः) = सौम्य बने रहें। अधिक-से-अधिक आदृत, परन्तु अधिक-से-अधिक विनीत। इस प्रकार बनने पर ही ये प्रभु के (वत्स) = प्रिय होते हैं। ये अपने जीवन से प्रभु का प्रतिपादन [ वद- बोलना] कर रहे होते हैं और इसी कारण प्रभु को प्रीणित = प्रसन्न कर पाते हैं और इस मन्त्र के ऋषि 'वत्सप्री' होते हैं।
Essence
भावार्थ- मन्त्रोक्त ग्यारह बातें हमारे जीवन में आनूदित हों और हम सच्चे प्रभुभक्त बनें।
Subject
प्रभुभक्त का जीवन