Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 32 / Mantra 5

16 Mantra
32/5
Devata- परमेश्वरो देवता Rishi- स्वयम्भु ब्रह्म ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्मा॑ज्जा॒तं न पु॒रा किं च॒नैव य आ॑ब॒भूव॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑।प्र॒जाप॑तिः प्र॒जया॑ सꣳररा॒णस्त्रीणि॒ ज्योती॑षि सचते॒ सः। षो॑ड॒शी॥५॥

यस्मा॑त्। जा॒तम्। न। पु॒रा। किम्। च॒न। ए॒व। यः। आ॒ब॒भूवेत्या॑ऽऽ ब॒भूव॑। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥ प्र॒जाऽप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। प्र॒जया॑ स॒ꣳर॒रा॒ण इति॑ सम्ऽररा॒णः। त्रीणि॑। ज्योती॑षि। स॒च॒ते॒। सः। षो॒ड॒शी ॥५ ॥

Mantra without Swara
यस्माज्जातन्न पुरा किञ्चनैव यऽआबभूव भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्रजया सँरराणस्त्रीणि ज्योतीँषि सचते स ऐडशी ॥

यस्मात्। जातम्। न। पुरा। किम्। चन। एव। यः। आबभूवेत्याऽऽ बभूव। भुवनानि। विश्वा॥ प्रजाऽपतिरिति प्रजाऽपतिः। प्रजया सꣳरराण इति सम्ऽरराणः। त्रीणि। ज्योतीषि। सचते। सः। षोडशी॥५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यस्मात्) = जिससे (पुरा) = पहले (किञ्चन एव) = कुछ भी (न जातम्) = नहीं हुआ, जो सबसे पहले से था। वे प्रभु अनादि है और सबके आदि है, अर्थात् सारे संसार का निर्माण कर रहे हैं। २. (यः) = जो (विश्वा भुवनानि) = सब लोकों को (आबभूव) = समन्तात् व्याप्त कर रहे हैं। प्रभु ने लोकों का निर्माण किया और उन सबके अन्दर व्याप्त होकर रहने लगा । ('तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्') = उसका सर्जन किया, उसमें प्रवेश किया। ३. प्रजापतिः = वे प्रभु सारी प्रजा के रक्षक हैं । ४. (सः षोडशी) = उस सोलह कला सम्पूर्ण प्रभु ने (प्रजया) = प्रजा के हेतु से, प्रजा के रक्षण के हेतु से (त्रीणि ज्योतींषि) = तीन ज्योतियों को (सचते) = धारण किया है। द्युलोक में सूर्य, अन्तरक्षिलोक में चन्द्र व विद्युत् तथा पृथिवीलोक पर अग्नि को प्रभु ने स्थापित किया है। प्रजा के रक्षण के लिए इन ज्योतियों की आवश्यकता स्वयं सिद्ध है। कितनी अद्भुत है यह सृष्टि ! इसके निर्माता प्रभु ' षोडशी' हैं, सोलह कला सम्पूर्ण हैं, वे पूर्ण हैं तभी तो उनकी बनायी यह सृष्टि भी पूर्ण हैं। 'पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ' =पूर्ण से पूर्ण ही उत्पन्न होता है। उस षोडशी प्रभु ने जीव में भी 'प्राण, श्रद्धा' आदि सोलह कलाओं को जन्म दिया है । ५. (संरराण:) = सम्यक् रमण-क्रीडा करते हुए प्रभु इस संसार का निर्माण करते हैं। संसार को प्रभु की क्रीडा के रूप में देखना ही ठीक रूप में देखना है। यही तत्त्वज्ञान है। इस तत्त्वज्ञानवाला व्यक्ति कष्टों से ऊपर उठ जाता है। खेल में लगी चोट क्रोध का कारण नहीं बनती। उस चोट के सहने में गौरव का अनुभव होता है। देव वही हैं जो प्रभु के साथ इस क्रीडा में सम्मिलित होते हैं 'दीव्यन्ति क्रीडन्तीति देवाः । देव खेलते हैं। इससे वे खिझते नहीं। देव ही महादेव का सान्निध्य प्राप्त करते हैं। ये स्वयं उस ब्रह्म- जैसे बन जाते हैं।
Essence
भावार्थ-संसार को प्रभु की क्रीड़ा के रूप में देखना ही तत्त्वज्ञान है। प्रभु ने जिन तीन ज्योतियों को धारण किया है, उन्हीं को धारण करना कल्याण का मार्ग है।
Subject
तीन ज्योतियाँ: रमण करता हुआ षोडशी य