Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 32 / Mantra 4

16 Mantra
32/4
Devata- आत्मा देवता Rishi- स्वयम्भु ब्रह्म ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒षो ह॑ दे॒वः प्र॒दिशोऽ नु॒ सर्वाः॒ पूर्वो॑ ह जा॒तः सऽ उ॒ गर्भे॑ऽ अ॒न्तः। सऽ ए॒व जा॒तः स ज॑नि॒ष्यमा॑णः प्र॒त्यङ् जना॑स्तिष्ठति स॒र्वतो॑मुखः॥४॥

ए॒षः। ह॒। दे॒वः। प्र॒दिश॒ इति॑ प्र॒ऽदिशः॑। अनु॑। सर्वाः॑। पूर्वः॑। ह॒। जा॒तः। सः। उँ॒ऽइत्यूँ॑। गर्भे॑। अ॒न्तरित्य॒न्तः ॥ सः। ए॒व। जा॒तः। सः। ज॒नि॒ष्यमा॑णः। प्र॒त्यङ्। जनाः॑। ति॒ष्ठ॒ति॒। सर्वतो॑मुख इति॑ स॒र्वतः॑ऽमुखः ॥४ ॥

Mantra without Swara
एषो ह देवः प्रदिशोनु सर्वाः पूर्वो ह जातः सऽउ गर्भेऽअन्तः । सऽएव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्थति सर्वतोमुखः ॥

एषः। ह। देवः। प्रदिश इति प्रऽदिशः। अनु। सर्वाः। पूर्वः। ह। जातः। सः। उँऽइत्यूँ। गर्भे। अन्तरित्यन्तः॥ सः। एव। जातः। सः। जनिष्यमाणः। प्रत्यङ् । जनाः। तिष्ठति। सर्वतोमुख इति सर्वतःऽमुखः॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (एषः) = ये प्रभु (ह) = निश्चय से (देवः) = देव हैं। देव के अर्थ यास्कानुसार निम्न हैं- [क] (देवो दानात्) = वे प्रभु देनेवाले हैं। प्रभु ने जीव के हित के लिए उसे क्या नहीं दिया? वे सब शक्तियों के देनेवाले हैं। [ख] (देवो दीपनात्) = वे प्रभु देदीप्यमान हैं। उस सर्वतो देदीप्यमान देव की दीप्ति की कल्पना आकाश में चमकते हुए सहस्रों सूर्यो की चमक से ही हो सकती है। [ग] (देवो द्योतनात्) = वे प्रभु सारे पिण्डों को द्योतित कर रहे हैं। प्रभु की दीप्ति से ही ये सारे सूर्य, चन्द्र व तारे दीप्त हो रहे हैं। २. ये प्रभु (सर्वाः प्रदिश:) = इन सब विस्तृत दिशाओं में (अनु) = [व्याप्य तिष्ठति] व्याप्त होकर रह रहे हैं। कौन-सा स्थल है, जहाँ प्रभु नहीं है। कण-कण में उस प्रभु की व्याप्ति है। ३. (पूर्वो ह जातः) = वे प्रभु निश्चय ही पहले से हैं। ('हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे') = हिरण्यगर्भ प्रभु इस सृष्टि से पूर्व विद्यमान हैं। उनका कोई आदि नहीं, अनादि होते हुए वे सभी के आदि हैं। वे स्वयं तो 'स्वयम्भू' = खुदा हैं। ४. (सः उ गर्भे अन्तः) = वे प्रभु ही सब पदार्थों के गर्भ में हैं। सबके अन्दर स्थित हुए हुए वे सबका नियमन कर रहे हैं। ५. (सः एव जात:) = वे प्रभु अनादिकाल से इन सृष्टियों को जन्म दे रहे हैं। माता प्रजाता' का अर्थ है 'माता ने बच्चे को जन्म दिया। इसी प्रकार यहाँ (स एव जात:) = उस प्रभु ने ही सृष्टि को जन्म दिया। 'जात:' यह भूतकाल का प्रत्यय सूचित कर रहा है कि भूत में न जाने कितने कालों से वे इन सृष्टियों का निर्माण कर रहे हैं। वस्तुतः अनादिकाल से यह चक्र चल रहा है। (सः जनिष्यमाणः) = भविष्य में भी वे इन सृष्टियों को जन्म देंगे। अनन्तकाल तक यह चक्र चलता जाएगा। यह सृष्टि-प्रलयचक्र न जाने कब से चल रहा है और न जाने कब तक चलता चलेगा। ६. इस सृष्टि में मनुष्य को जन्म देकर प्रभु ही उसको ज्ञान भी देते हैं। हे (जनाः) = मनुष्यो ! वे प्रभु (प्रत्यङ) = तुम्हारे आत्मा में ही (तिष्ठति) = स्थित हैं। वे एक साथ अग्नि को ऋग्वेद का, वायु को यजुर्वेद का, सूर्य को सामवेद का और अङ्गिरा को अथर्ववेद का उपदेश दे रहे हैं, क्योंकि वे (सर्वतोमुखः)=- सब ओर मुखवाले है । ७. उस प्रभु को ढूँढने के लिए तीर्थों में भटकने की आवश्यकता नहीं वे तो अन्दर ही हैं। सब विद्याएँ पढ़कर भी [ब्रह्मचारी]. यज्ञादि करके भी [गृहस्थ] स्तुति व कीर्तन में लगकर भी [ वानप्रस्थ] मनुष्य प्रभु को तभी देखेगा जब वह अपने अन्दर ध्यान करेगा। यह अन्तर्मुख यात्रा करनेवाला संन्यासी ही 'ब्रह्माश्रमी' बनता है, ब्रह्म को देखता है। ऋग्वेद से सब विज्ञानों का अध्ययन करके, यजुर्वेद के अनुसार सब यज्ञों का अनुष्ठान करके, सामवेद से उपासना करके जब मनुष्य [अथ] अपने अन्दर [अर्वाङ] देखता है तभी ब्रह्म का दर्शन करता है। अथर्ववेद इसीलिए ब्रह्मवेद कहलाता है [अथ+अर्वाङ] ।
Essence
भावार्थ- हम देव, सब दिशाओं में व्याप्त, अनादि, अनन्त, सृष्टि-प्रलय-चक्र को चलानेवाले, हृदय में विद्यमान, सर्वतोमुख प्रभु का ध्यान करें।
Subject
सर्वतोमुख देव