Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 32 / Mantra 12

16 Mantra
32/12
Devata- परमात्मा देवता Rishi- स्वयम्भु ब्रह्म ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी स॒द्यऽ इ॒त्वा परि॑ लो॒कान् परि॒ दि॒शः परि॒ स्वः।ऋ॒तस्य॒ तन्तुं॒ वित॑तं वि॒चृत्य॒ तद॑पश्य॒त् तद॑भव॒त् तदा॑सीत्॥१२॥

परि॑। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑ऽपृथि॒वी। स॒द्यः। इ॒त्वा। परि॑। लो॒कान्। परि॑। दिशः॑। परि॑। स्व᳖रिति॒ स्वः᳖। ऋ॒तस्य॑। तन्तु॑म्। वित॑त॒मिति॒ विऽत॑तम्। वि॒चृत्येति॑ वि॒ऽचृत्य॑। तत्। अ॒प॒श्य॒त्। तत्। अ॒भ॒व॒त्। तत्। आ॒सी॒त् ॥१२ ॥

Mantra without Swara
परि द्यावापृथिवी सद्यऽइत्वा परि लोकान्परि दिशः परि स्वः । ऋतस्य तन्तुँविततँविचृत्य तदपश्यत्तदभवत्तदासीत् ॥

परि। द्यावापृथिवी इति द्यावाऽपृथिवी। सद्यः। इत्वा। परि। लोकान्। परि। दिशः। परि। स्वरिति स्वः। ऋतस्य। तन्तुम्। विततमिति विऽततम्। विचृत्येति विऽचृत्य। तत्। अपश्यत्। तत्। अभवत्। तत्। आसीत्॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. यहाँ पिछले मन्त्र के 'भूतानि' पद का स्थान द्यावापृथिवी' ने ले लिया है। (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक के मध्य में होनेवाले प्राणियों के मनोभावों को (सद्यः) = शीघ्र ही (परि + इत्वा) = खूब समझकर । २. (परि लोकान्) = सब लोकों को समझकर । इनको समझना इनके ठीक प्रयोग के लिए आवश्यक है। प्रभु की महिमा तो इन्हीं में दिखती है । ३. (दिशः परि) = सब दिशाओं में भ्रमण करके । भ्रमण से हम बहुदृष्ट व बहुश्रुत बनेंगे। सृष्टि का वैविध्य हमें विविधता के निर्माता का स्मरण कराएगा। (स्वः परि) = इस स्वयं, देदीप्यमान ज्योति सूर्य [स्वयं राजते] को देखकर सूर्य प्रभु की सर्वमहान् विभूति है। 'योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्' [यजुः] यह आदित्य में दिखनेवाला पुरुष ही तो वह परमात्मा है। ५. वे प्रभु 'ऋत' हैं और उस प्रभु में ही ये सारे लोक-लोकान्तर पिरोये हुए हैं। एवं, यह ऋत का तन्तु सब लोकों में ओत-प्रोत है। इस (ऋतस्य तन्तुम्) = ऋत के तन्तु को जो (विततम्) = सारे लोकों में विस्तृत है, (विचृत्य) = विश्लिष्ट रूप से जानकर 'मुञ्जादिव इषीकाम्' मुञ्ज को हटाकर जैसे सींक को देखते हैं, उसी प्रकार अन्नमयादि कोशों को अलग करते हुए मनुष्य क्रमशः अन्न से प्राण में प्राण से मन में, मन से विज्ञान में और विज्ञान से आनन्द में पहुँचता हुआ (तत् अपश्यत्) = उस प्रभु को देखता है। प्रभु को देखता क्या है ? (तत् अभवत्) = प्रभु जैसा ही हो जाता है। उस प्रभु की लाली मुझे भी लाल कर देती है। उस प्रभु की अग्नि में पड़कर मैं भी अग्नि के समान चमकने लगता हूँ। (तत् आसीत्) = उस प्रभु-जैसा ही तो वह जीव था। इसका साधर्म्य प्रकृति के साथ न होकर प्रभु के साथ ही तो था । प्रभु की तरह यह भी 'चित्' ही था। हाँ, अल्पज्ञता के कारण इसपर राग-द्वेषादि मलों का एक आवरण चढ़ गया था। आज प्रभु को देखकर यह उस आवरण को परे फेंककर उस जैसा हो गया है। जीव प्रभु का ही तो छोटा रूप है। प्रभुरूप मणि तो अत्यन्त विशाल व महान् होने से मलिन ही नहीं होती, जीवरूप छोटी मणि अवश्य मलिन हो गई थी, परन्तु आज सब मल और भेद-भाव समाप्त होकर जीव प्रभु-जैसा दिखने लगता है।
Essence
भावार्थ- हम ठीक व्यवहार से मन को शान्त, वस्तुओं के ठीक प्रयोग से शरीर को नीरोग, भ्रमण से दृष्टि को विशाल, सूर्य दर्शन से प्रभु महिमा का दर्शन करके उस ऋत के वितत तन्तु का विश्लेषण करें और प्रभु का दर्शन कर प्रभु जैसे ही बन जाएँ।
Subject
दर्शन व तन्मयता