Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 32 / Mantra 10

16 Mantra
32/10
Devata- परमात्मा देवता Rishi- स्वयम्भु ब्रह्म ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स नो॒ बन्धु॑र्जनि॒ता स वि॑धा॒ता धामा॑नि वेद॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑।यत्र॑ दे॒वाऽ अ॒मृत॑मानशा॒नास्तृ॒तीये॒ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त॥१०॥

सः। नः॒। बन्धुः॑। ज॒नि॒ता। सः। वि॒धा॒तेति॑ विऽधा॒ता। धामा॑नि। वे॒द॒। भुव॑नानि। विश्वा॑ ॥ यत्र॑। दे॒वाः। अ॒मृत॑म्। आ॒न॒शा॒नाः। तृ॒तीये॑। धाम॑न्। अ॒ध्यैर॑य॒न्तेत्य॑धि॒ऽऐर॑यन्त ॥१० ॥

Mantra without Swara
स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यत्र देवाऽअमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्ऐरयन्त ॥

सः। नः। बन्धुः। जनिता। सः। विधातेति विऽधाता। धामानि। वेद। भुवनानि। विश्वा॥ यत्र। देवाः। अमृतम्। आनशानाः। तृतीये। धामन्। अध्यैरयन्तेत्यधिऽऐरयन्त॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सः) = वे प्रभु (नः) = हमारे (बन्धुः) = बन्धु हैं। बन्धु शब्द में मौलिक भावना 'बन्धन' की है। रिश्तेदार भी 'बन्धु' इसीलिए कहलाते हैं कि वे हमें एक बन्धन में बाँध देते हैं । २. (जनिता) = वे प्रभु हमें जन्म देनेवाले हैं, पिता हैं। कर्मानुसार उस-उस योनि में जन्म देने के कारण वे प्रभु हमारे 'जनिता' हैं। ३. वे प्रभु (विश्वा) = सब (भुवनानि) = लोकों को तथा (धामानि) = उन लोकों में उस उस घर को तथा तेज को वे प्रभु वेद हमें प्राप्त कराते हैं [विद् लाभे] 'यथाकर्म यथा श्रुतम्' हमारे कर्म व ज्ञान के अनुसार वे प्रभु हमें उस उस लोक में तथा उस उस योनि में जन्म देते हैं। ये सब लोक-लोकान्तर भिन्न-भिन्न कर्मों के अनुसार जन्म देने के लिए ही प्रभु ने निर्मित किये हैं। उन-उन लोकों में दिये गये शरीर 'धाम' हैं और इन शरीरों में प्राप्त करायी गई शक्ति भी 'धाम' है। ५. (यत्र) = जिस शरीर में (देवा:) = देव लोग (अमृतमानशाना:) = उस 'अमृत' प्रभु का सेवन करते हुए (तृतीये धामन्) = तृतीय स्थान में (अध्यैरयन्त) = विचरते हैं। [क] असुर लोग तमोगुण में विचरते हुए प्राकृतिक भोगों को ही परम ध्येय बनाते हैं। [ख] असुरों से ऊपर मनुष्य हैं। कुछ मनन- चिन्तन करने के कारण ये भोगों से कुछ ऊपर उठकर तमोगुण से ऊपर रजोगुण में विचरते हैं तथा शक्ति व यश को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। ये नाना प्रकार के लोकहितकारी कार्यों को करके यशोलाभ करते हैं। [ग] इनसे भी ऊपर देव लोग हैं, ये सत्त्वगुण में अवस्थित हुए हुए उस प्रभु को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। ये प्रभु ही तृतीय धाम हैं। देव सदा प्रभु में विचरते हैं। तृतीय धाम का चित्रण निम्न कोष्ठक से स्पष्ट है- स्वार्थ- प्रथम : तमस्, असुर, प्रकृति, भोग व द्वितीय:- रजस्, मनुष्य, जीव, यश, स्वार्थ, विरुद व परार्थ तृतीय:- सत्त्व, देव, परमात्मा, अमृतत्व व परार्थ
Essence
भावार्थ - इस शरीर में हम तमोगुण व रजोगुण से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में विचरते हुए प्रकृति व जीव से परे उस तृतीय धाम प्रभु में विचरें। इसी से हम अमृतत्त्व का लाभ कर सकेंगे।
Subject
तृतीय धाम