Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 31 / Mantra 13

16 Mantra
31/13
Devata- पुरुषो देवता Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
नाभ्या॑ऽआसीद॒न्तरि॑क्षꣳ शी॒र्ष्णो द्यौः सम॑वर्त्तत।प॒द्भयां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा॒त्तथा॑ लो॒काँ२॥ऽअ॑कल्पयन्॥१३॥

नाभ्याः॑। आ॒सी॒त्। अ॒न्तरि॑क्षम्। शी॒र्ष्णः। द्यौः। सम्। अ॒व॒र्त्त॒त॒ ॥ प॒द्भ्यामिति॑ प॒त्ऽभ्याम्। भूमिः॑। दिशः॑। श्रोत्रा॑त्। तथा॑। लो॒कान् ॥ अ॒क॒ल्प॒य॒न् ॥१३ ॥

Mantra without Swara
नाभ्याऽआसीदन्तरिक्षँ शीर्ष्णा द्यौः समवर्तत । पद्भ्याम्भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँऽअकल्पयन् ॥

नाभ्याः। आसीत्। अन्तरिक्षम्। शीर्ष्णः। द्यौः। सम्। अवर्त्तत॥ पद्भ्यामिति पत्ऽभ्याम्। भूमिः। दिशः। श्रोत्रात्। तथा। लोकान्॥ अकल्पयन्॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (नाभ्या) = [नाभ्यै] नाभि के लिए अथवा नाभि के हेतु से (अन्तरिक्षम्) = अन्तरिक्ष (आसीत्) = होता है। नाभि केन्द्र है, सारी नस-नाड़ियाँ अन्त में यहीं बँधी हैं। इस केन्द्र के ठीक रखने से यह प्रभुभक्त मध्यमार्ग में चलनेवाला [ अन्तरा + क्षि-बीच में चलना ] होता है। शरीर के केन्द्र को ठीक रखने के लिए मध्यमार्ग में रहना आवश्यक है । २. (शीर्ष्ण:) = मस्तिष्क से (द्यौः) = द्युलोक समवर्त्तत हो जाता है। जिस प्रकार द्युलोक जगमगाता है, इसी प्रकार इस प्रभुभक्त का मस्तिष्क भी ज्ञान के सूर्य व विज्ञान के नक्षत्रों से चमकता है। ३. (पद्भ्याम्) = पाँव से यह (भूमिः) = भूमि हो जाता है । पाँव [पद गतौ ] गति के प्रतीक हैं। भूमि को भूमि इसलिए कहते हैं कि इसमें प्राणी होते हैं [ भवन्ति भूतानि यस्याम्] । यह प्रभुभक्त अपनी गति के द्वारा सब प्राणियों के निवास का कारण बनता है। इसकी क्रिया रक्षक है, नकि नाशक । ४. (श्रोत्रात्) = श्रोत्र से (दिशः) = यह दिश् बन जाता है। श्रोत्र का दूसरा अर्थ वेद है। यह अपने जीवन के सब निर्देश [आदेश व सन्देश] वेद से ही प्राप्त करता है। इसका जीवन वेदानुकूल होता है। ('धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः') = धर्म के लिए परमप्रमाण श्रुति ही है । ५. (तथा) = उस प्रकार - ऊपर कथित प्रकार से यह प्रभुभक्त (लोकान्) = इस पिण्ड के एक-एक लोक [Locality] को - अङ्ग-प्रत्यङ्ग को (अकल्पयन्) = शक्तिशाली बनाता है। शक्तिसम्पन्न बनकर यह प्रभुभक्त 'पावकवर्ण, शुचि व विपश्चित्' बन जाता है।
Essence
भावार्थ-यह प्रभुभक्त सदा मध्यमार्ग पर चलनेवाला, जगमगाते मस्तिष्कवाला, निर्माणात्मक क्रियाओं में लगा हुआ, वेद के अनुसार जीवन-मार्ग पर चलता हुआ शक्तिशाली अङ्गोंवाला बनता है।
Subject
लोक-कल्याण