Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 7

22 Mantra
30/7
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तप॑से कौला॒लं मा॒यायै॑ क॒र्मार॑ꣳ रू॒पाय॑ मणिका॒रꣳ शु॒भे वप॒ꣳ श॑र॒व्यायाऽइषुका॒रꣳ हे॒त्यै ध॑नुष्का॒रं कर्म॑णे ज्याका॒रं दि॒ष्टाय॑ रज्जुस॒र्जं मृ॒त्यवे॑ मृग॒युमन्त॑काय श्व॒निन॑म्॥७॥

तप॑से। कौ॒ला॒लम्। मा॒यायै॑। क॒र्मार॑म्। रू॒पा॑य। म॒णि॒का॒रमिति॑ मणिऽका॒रम्। शु॒भे। व॒पम्। श॒र॒व्या᳖यै। इ॒षु॒का॒रमिती॑षुऽका॒रम्। हे॒त्यै। ध॒नु॒ष्का॒रम्। ध॒नुः॒का॒रमिति॑ धनुःऽका॒रम्। कर्म॑णे। ज्या॒का॒रमिति॑ ज्याऽका॒रम्। दि॒ष्टाय॑। र॒ज्जु॒स॒र्जमिति॑ रज्जुऽस॒र्जम्। मृ॒त्यवे॑। मृ॒ग॒युमिति॑ मृग॒ऽयुम्। अन्त॑काय। श्व॒निन॒मिति॑ श्व॒ऽनिन॑म् ॥७ ॥

Mantra without Swara
तपसे कौलालम्मायायै कर्मारँ रूपाय मणिकारँ शुभे वपँ शरव्यायाऽइषुकारँ हेत्यै धनुष्कारङ्कर्मणे ज्याकारन्दिष्टाय रज्जुसर्जम्मृत्यवे मृगयुमन्तकाय श्वनिनम् ॥

तपसे। कौलालम्। मायायै। कर्मारम्। रूपाय। मणिकारमिति मणिऽकारम्। शुभे। वपम्। शरव्यायै। इषुकारमितीषुऽकारम्। हेत्यै। धनुष्कारम्। धनुःकारमिति धनुःऽकारम्। कर्मणे। ज्याकारमिति ज्याऽकारम्। दिष्टाय। रज्जुसर्जमिति रज्जुऽसर्जम्। मृत्यवे। मृगयुमिति मृगऽयुम्। अन्तकाय। श्वनिनमिति श्वऽनिनम्॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
२१. (तपसे कौलालम्) = तपनेवाले कार्यों के लिए कुम्हार के पुत्र को प्राप्त करे। वह सदा भट्टी के तपाने से उन कार्यों के लिए अधिक अभ्यस्त होता है। ऋत, सत्य आदि उत्तम तप के लिए कुलीन पुरुष को संयुक्त करे, यह कुल में कलह होने के भय से तप को न छोड़ेगा । २२. (मायायै कर्मारम्) = बुद्धि व आश्चर्य [माया] के कार्य करने के लिए लोहार को प्राप्त करे। 'किस प्रकार लोहार लोहे को लेकर उसे अद्भुत यन्त्र में परिवर्तित कर देता है', यह सब जादू-सा प्रतीत होता है। २३. (रूपाय मणिकारम्) = आभूषणादि सुन्दर वस्तु बनाने के लिए मणिकार को प्राप्त करे। २४. [क] (शुभे) = मुखादि की शोभा बढ़ाने के लिए (वपम्) = नाई को प्राप्त करे, नाई बालों को ठीक-ठाक करके 'शुन्धिशिर: ' सिर आदि का ठीक शोधन कर देता है। [ख] अथवा (शुभे) = राष्ट्र की शोभा के लिए (वपम्) = बीज को बोनेवाले किसान को प्राप्त करे। वे ही राष्ट्र में अन्नादि की समुचित वृद्धि करके राष्ट्र की शोभा को बढ़ाते हैं । २५. (शरव्यायै इषुकारम्) = शरसमूह को प्राप्त करने के लिए बाण बनानेवाले को प्राप्त करे। २६. हेत्यै दूर फेंकनेवाले अस्त्रों के लिए (धनुष्कारम्) = धनुष बनानेवाले शिल्पी को प्राप्त करे। २७ (कर्मणे ज्याकारम्) = युद्ध के कार्यों के लिए धनुष की डोरी आदि बनानेवाले शिल्पी को प्राप्त करे। २८. (दिष्टाय रज्जुसर्जम्) = आज्ञाओं के पालन कराने के लिए रज्जु का निर्माण करनेवाले को नियत करे। आज्ञा न माननेवालों को बन्धन में डालने के लिए वह सदा तैयार हो। नियमन का भय ही शासन का पालन कराता है। २९. (मृत्यवे मृगयुम्) = दुष्ट प्राणियों के वध के लिए, ग्राम के आतङ्क का कारण बन जानेवाले चीते आदि को मारने के लिए शिकारी को प्राप्त करे। ३०. (अन्तकाय) = दुष्टों का अन्त करने के लिए (श्वनिनम्) = कुत्तों को पालनेवाले शिकारी [Hound] को प्राप्त करे।
Essence
भावार्थ - मृगयु, श्वनी आदि को भी राजा राष्ट्र के उपयोगी कार्यों में विनियुक्त करे । उनके द्वारा शेर आदि की हत्या कराके ग्रामवासियों के आतङ्क को दूर करे।
Subject
तप के लिए कौलाल को