Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 2

22 Mantra
30/2
Devata- सविता देवता Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥२॥

तत्। स॒वि॒तुः। वरे॑ण्यम्। भर्गः॑। दे॒वस्य॑। धी॒म॒हि॒। धियः॑। यः। नः॒। प्र॒चो॒दया॒दिति॑ प्रऽचो॒दया॑त् ॥२ ॥

Mantra without Swara
तत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयत् ॥

तत्। सवितुः। वरेण्यम्। भर्गः। देवस्य। धीमहि। धियः। यः। नः। प्रचोदयादिति प्रऽचोदयात्॥२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार 'यज्ञ + ज्ञान व वाङ्माधुर्य' को अपनाकर हम अपने जीवन को इस प्रकार उच्च बनाएँ कि हम प्रभु के तेज को धारण करनेवाले बनें। प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि (यः) = जो (नः) = हमारी (धियः) = बुद्धियों को (प्रचोदयात्) = प्रकृष्ट यज्ञादि की प्रेरणा प्राप्त कराए (तत्सवितुः) = [ स चासौ सविता च] उस सर्वव्यापक [तन् विस्तारे] सकल जगदुत्पादक व प्रेरक (देवस्य) = दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभु के (वरेण्यम्) = वरने योग्य (भर्गः) = [ भ्रस्ज पाके] पापों को भून डालनेवाले तेज को (धीमहि) = हम धारण करें । २. उसी तेज की शक्ति को हम अपना लक्ष्य बनाएँ। यह लक्ष्य ही हमारी पापवृत्तियों को समाप्त करेगा। इस लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए हम बुराइयों से बचे रहेंगे। ३. हृदयस्थरूपेण वे प्रभु हमें सदा उत्तम कर्मों की प्रेरणा दे ही रहे हैं। 'उस प्रभु के समान मुझे भी तेजस्वी बनना है' यही सर्वमहान् लक्ष्य है । लक्ष्य की ऊँचाई के अनुपात में ही हमारी उन्नति होती है। ऊँचे लक्ष्य से हम बुरइयों में फँसने से बचते हैं और प्रभु-जैसे बनते चलते हैं। प्रभु 'ब्रह्म' हैं, हम 'ब्रह्म इव' हो जाते हैं। लोहा अग्नि में पड़कर अग्नि-सा देदीप्यमान हो उठता है ।
Essence
भावार्थ- हम निरन्तर प्रभु का ध्यान करें, प्रभु की तेजस्विता हमारे लिए वरेण्य हो । यह लक्ष्य हमें मार्गभ्रष्ट होने से बचाएगा।
Subject
वरेण्य भर्ग