Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 19

22 Mantra
30/19
Devata- राजेश्वरौ देवते Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- भुरिग्धृतिः Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्र॒ति॒श्रुत्का॑याऽअर्त्त॒नं घोषा॑य भ॒षमन्ता॑य बहुवा॒दिन॑मन॒न्ताय॒ मूक॒ꣳ शब्दा॑याडम्बराघा॒तं मह॑से वीणावा॒दं क्रोशा॑य तूणव॒ध्मम॑वरस्प॒राय॑ शङ्ख॒ध्मं वना॑य वन॒पम॒न्यतो॑ऽरण्याय दाव॒पम्॥१९॥

प्र॒ति॒श्रुत्का॑या॒ इति॑ प्रति॒ऽश्रुत्का॑यै। अ॒र्त्त॒नम्। घोषा॑य। भ॒षम्। अन्ता॑य। ब॒हु॒वा॒दिन॒मिति॑ बहुऽवा॒दिन॑म्। अ॒न॒न्ताय॑। मूक॑म्। शब्दा॑य। आ॒ड॒म्ब॒रा॒घा॒तमित्या॑डम्बरऽआघा॒तम्। मह॑से। वी॒णा॒वा॒दमिति॑ वीणाऽवा॒दम्। क्रोशा॑य। तू॒ण॒व॒ध्ममिति॑ तृणव॒ऽध्मम्। अ॒व॒र॒स्प॒राय॑। अ॒व॒र॒प॒रायेति॑ अवरऽप॒राय॑। श॒ङ्ख॒ध्ममिति॑ शङ्ख॒ऽध्मम्। वना॑य। व॒न॒पमिति॑ वन॒ऽपम्। अ॒न्यतो॑रण्या॒येत्यन्यतः॑ऽअरण्याय। दा॒व॒पमिति॑ दाव॒ऽपम् ॥१९ ॥

Mantra without Swara
प्रतिश्रुत्कायाऽअर्तनङ्घोषाय भषमन्ताय बहुवादिनमनन्ताय मूकङ्शब्दायाडम्बराघातम्महसे वीणावादङ्क्रोशाय तूणवध्ममवरस्पराय शङ्खध्मँवनाय वतपमन्यतोरण्याय दावपम् ॥

प्रतिश्रुत्काया इति प्रतिऽश्रुत्कायै। अर्त्तनम्। घोषाय। भषम्। अन्ताय। बहुवादिनमिति बहुऽवादिनम्। अनन्ताय। मूकम्। शब्दाय। आडम्बराघातमित्याडम्बरऽआघातम्। महसे। वीणावादमिति वीणाऽवादम्। क्रोशाय। तूणवध्ममिति तृणवऽध्मम्। अवरस्पराय। अवरपरायेति अवरऽपराय। शङ्खध्ममिति शङ्खऽध्मम्। वनाय। वनपमिति वनऽपम्। अन्यतोरण्यायेत्यन्यतःऽअरण्याय। दावपमिति दावऽपम्॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१४३. (प्रतिश्रुत्काय) = प्रतिज्ञापूर्ति के लिए (अर्तनम्) = प्रेरक को नियत करे। यह निरन्तर उत्तम प्रेरणा देता हुआ उन्हें प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए उत्साहित करता रहेगा। १४४. (घोषाय्) = उद्घोषणा के लिए (भषम्) = ऊँची आवाज़ से बोलनेवाले को प्राप्त करे। १४५. [क] (अन्ताय) = सिद्धान्त पर पहुँचने के लिए (बहुवादिनम्) = उत्तम वक्ता को नियत करे । [ख] इस वाक्य में ऐसी भावना भी सूचित होती है कि बहुत बोलनेवाले को अन्त के लिए जाने, अर्थात् 'इसका आयुष्य अल्प हो जाता है' ऐसा समझे । १४६. (अनन्ताय) = उस अनन्त प्रभु के उपदेश के लिए (मूकम्) = मौन धारण करनेवाले को प्राप्त करे, क्योंकि ईश का उपदेश तो ('गुरोस्तु मौनं व्याख्यानम्') = के अनुसार मौन से ही दिया जाता है। साथ ही कम बोलनेवाले को दीर्घायुष्यवाला जाने। १४७. शब्दाय शब्द करने के लिए, पक्षी आदि को भयभीत करने के लिए [आवाज़] करने के लिए (आडम्बराघातम्) = ढोल बजानेवाले को प्राप्त करे। १४८. (महसे) = उत्सवों के लिए, उत्सवों में सभ्यों के विनोदार्थ (वीणावादम्) = वीणा बजानेवाले को प्राप्त करे। १४९. (क्रोशाय) = लोगों को एकत्र होने की सूचना देने के लिए [आह्वान के लिए] (तूणवध्मम्) = ढक्का बाजनेवाले को प्राप्त करे। १५०. (अवरस्पराय) = आस-पास के लोगों को प्रार्थना आदि के लिए बुलाना हो तो (शंखधम्) = शंख बजानेवाले को प्राप्त करे। १५१. (वनाय) = वनों की रक्षा के लिए (वनपम्) = वनों के रक्षक को नियत करे। १५२. (अन्यतः अरण्याय) = दूसरे घने जंगलों के लिए (दावपम्) = वनाग्नि से रक्षा करनेवाले को नियत करे। नगर के समीप साधारण वन की रक्षा के लिए वनाय की नियुक्ति है 'इन उपवनों का कोई दुरुपयोग न करे' इसके लिए निगरानी करनेवाले को रखना है और घने जंगलों की रक्षा के लिए दावपों की नियुक्ति है। उन वनों में अचानक आग लगने से लाखों की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है।
Essence
भावार्थ - जहाँ उद्घोषणा आदि के लिए ढोल आदि बजानेवाले की नियुक्ति करनी है वहाँ वनों की रक्षा के लिए रक्षापुरुषों को भी नियुक्त करना है।
Subject
प्रतिश्रुत्क के लिए अर्तन को