Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 18

22 Mantra
30/18
Devata- राजेश्वरौ देवते Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- निचृत्प्रकृतिः Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒क्ष॒रा॒जाय॑ कित॒वं कृ॒ताया॑दिनवद॒र्शं त्रेता॑यै क॒ल्पिनं॑ द्वा॒परा॑याधिक॒ल्पिन॑मास्क॒न्दाय॑ सभास्था॒णुं मृ॒त्यवे॑ गोव्य॒च्छमन्त॑काय गोघा॒तं क्षु॒धे यो गां वि॑कृ॒न्तन्तं॒ भिक्ष॑माणऽउप॒ तिष्ठ॑ति दुष्कृ॒ताय॒ चर॑काचार्यं पा॒प्मने॑ सैल॒गम्॥१८॥

अ॒क्ष॒रा॒जायेत्य॑क्षऽरा॒जाय॑। कि॒त॒वम्। कृ॒ताय॑। आ॒दि॒न॒व॒द॒र्शमित्या॑दिनवऽद॒र्शम्। त्रैता॑यै। क॒ल्पिन॑म्। द्वा॒परा॑य। अ॒धि॒क॒ल्पिन॒मित्य॑धिऽक॒ल्पिन॑म्। आ॒स्क॒न्दायेत्या॑ऽस्क॒न्दाय॑। स॒भा॒स्था॒णुमिति॑ सभाऽस्था॒णुम्। मृ॒त्यवे॑। गो॒व्य॒च्छमिति॑ गोऽव्य॒च्छम्। अन्त॑काय। गो॒घा॒तमिति॑ गोऽघा॒तम्। क्षु॒धे। यः। गाम्। वि॒कृ॒न्तन्त॒मिति॑ विऽकृ॒न्तन्त॑म्। भिक्ष॑माणः। उ॒प॒तिष्ठ॒तीत्यु॑प॒ऽतिष्ठ॑ति। दु॒ष्कृ॒ताय॑। दुः॒कृ॒तायेति॑ दुःऽकृ॒ताय॑। चर॑काचार्य्य॒मिति॒ चर॑कऽआचार्य्यम्। पा॒प्मने॑। सै॒ल॒गम् ॥१८ ॥

Mantra without Swara
अक्षराजाय कितवङ्कृतायादिनवदर्शन्त्रेतायै कल्पिनन्द्वापरायाधिकल्पिनमास्कन्दाय सभास्थाणुम्मृत्यवे गोव्यच्छमन्तकाय गोघातङ्क्षुधे यो गाँविकृन्तन्तम्भिक्षमाणऽउपतिष्ठति दुष्कृताय चरकाचार्यं पाप्मने सैलगम् ॥

अक्षराजायेत्यक्षऽराजाय। कितवम्। कृताय। आदिनवदर्शमित्यादिनवऽदर्शम्। त्रैतायै। कल्पिनम्। द्वापराय। अधिकपिल्पनमित्यधिऽकल्पिनम्। आस्कन्दायेत्याऽस्कन्दाय। सभास्थाणुमिति सभाऽस्थाणुम्। मृत्यवे। गोव्यच्छमिति गोऽव्यच्छम्। अन्तकाय। गोघातमिति गोऽघातम्। क्षुधे। यः। गाम्। विकृन्तन्तमिति विऽकृन्तन्तम्। भिक्षमाणः। उपतिष्ठतीत्युपऽतिष्ठति। दुष्कृताय। दुःकृतायेति दुःऽकृताय। चरकाचार्य्यमिति चरकऽआचार्य्यम्। पाप्मने। सैलगम्॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१३३. (अक्षराजाय) = राजा की आँखरूप गुप्तचरों के [ चारैः पश्यन्ति राजानः ] अध्यक्ष पद के लिए (कितवम्) = [कित् ज्ञाने] अत्यन्त समझदार पुरुष को प्राप्त करे। १३४. (कृताय) = किये जा चुके, सम्पन्न कर्मों के लिए (आदिनवदर्शम्) = उन कर्मों में रह गये दोषों को देखनेवाले पुरुष को प्राप्त करे, ताकि उन दोषों को दूर किया जा सके। १३५. (त्रेतायै) = 'अग्नित्रयमिदम् त्रेता' गार्हपत्य, आहवनीय व (दक्षिणाग्नि) = इन तीन अग्नियों के कार्यों को ठीक रखने के लिए (कल्पिनम्) = कल्पशास्त्र में निपुण व्यक्ति को प्राप्त करे। इन कल्पसूत्रों में यज्ञों की वेदियों के विधि-विधानों का प्रतिपादन है। उनको ठीक से जाननेवाला यज्ञ के कार्यों को ठीक चला सकेगा। १३६. (द्वापराय) = [ द्वौ परौ यस्य] धर्म और मोक्ष ही परअन्तिम उद्देश्य हैं, जिसके 'धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष' में एक सीमा पर धर्म और दूसरी सीमा पर मोक्ष ही जिसके जीवन के अङ्ग है, उसके लिए (अधिकल्पिनम्) = अधिक सामर्थ्यवाले पुरुष को नियत करे। यह धर्मपूर्वक राष्ट्र के कार्य करता हुआ, दोषों से मुक्त रहता हुआ, अन्त में मोक्ष को प्राप्त करेगा। सामान्य व्यक्ति तो अर्थ व काम में ही फँस जाता है। १३७. (आस्कन्दाय) = चारों ओर ज्ञान के प्रसार के द्वारा [गति = ज्ञान] दोषों के शोषण के लिए (सभास्थाणुम्) = सभा में स्थिरता से रहनेवाले को नियत करे। यह उत्तम नियमों के निर्माण व प्रचार के द्वारा प्रजा के दोषों का शोषण करना अपना कार्य समझे । १३८. (गोव्यच्छम्) = गौ को पीड़ित करनेवाले को (मृत्यवे) = मृत्यु के लिए प्राप्त करे। १३९. (गोघातम्) = गोहत्या करनेवाले को (अन्तकाय) = बधक के लिए प्राप्त करे, अर्थात् गोघाती को वधदण्ड दे । १४०. (गां विकृन्तन्तम्) = गौ को काटते हुए पुरुष को (यः) = जो (भिक्षमाणः) = भीख माँगता हुआ उपतिष्ठति उपस्थित होता है उसे (क्षुधे) = भूख के लिए प्राप्त करे, अर्थात् ऐसे व्यक्ति को भूखा रखने का दण्ड दिया जाए। १४१. (दुष्कृताय) = पापों को दूर करने के लिए (चरकाचार्यम्) = भ्रमणशील आचार्यों को स्थित करे, जो घूम-फिरकर प्रजा को ज्ञान देते हुए दुष्कृत्यों को करे। १४२. (पाप्मने) = पापी पुरुष के लिए (सैलगम्) = [ सैलेन सह गच्छति ] अस्त्रधारी पुरुष को नियत करे ।
Essence
भावार्थ - राष्ट्र में गोहत्या आदि पापों को दूर करने का पूर्ण प्रयत्न किया जाए।
Subject
अक्षराज के लिए कितव को