Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 17

22 Mantra
30/17
Devata- राजेश्वरौ देवते Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- विराट् धृतिः Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
बी॒भ॒त्सायै॑ पौल्क॒सं वर्णा॑य हिरण्यकारं तु॒लायै॑ वाणि॒जं प॑श्चादो॒षाय॑ ग्ला॒विनं॒ विश्वे॑भ्यो भू॒तेभ्यः॑ सिध्म॒लं भूत्यै॑ जागर॒णमभू॑त्यै स्वप॒नमार्त्यै॑ जनवा॒दिनं॒ व्यृद्ध्याऽअपग॒ल्भꣳ सꣳश॒राय॑ प्र॒च्छिद॑म्॥१७॥

बी॒भ॒त्सायै॑। पौ॒ल्क॒सम्। वर्णा॑य। हि॒र॒ण्य॒का॒रमिति॑ हिरण्यऽका॒रम्। तु॒लायै॑। वा॒णि॒जम्। प॒श्चा॒दो॒षायेति॑ पश्चाऽदो॒षाय॑। ग्ला॒विन॑म्। विश्वे॑भ्यः। भू॒तेभ्यः॑। सि॒ध्म॒लम्। भूत्यै॑। जा॒ग॒र॒णम्। अभू॑त्यै। स्व॒प॒नम्। आर्त्या॒ इत्याऽऋ॑त्यै। ज॒न॒वा॒दिन॒मिति॑ जनऽवा॒दिन॑म्। व्यृ᳖द्ध्या इति॒ विऽऋ॑ध्यै। अ॒प॒ग॒ल्भमित्य॑पऽग॒ल्भम्। स॒ꣳश॒रायेति॑ सम्ऽश॒राय॑। प्र॒च्छिद॒मिति॑ प्र॒ऽच्छिद॑म् ॥१७ ॥

Mantra without Swara
बीभत्सायै पौल्कसँवर्णाय हिरण्यकारन्तुलायै वाणिजम्पश्चादोषाय ग्लाविनँविश्वेभ्यो भूतेभ्यः सिध्मलम्भूत्यै जागरणमभूत्यै स्वपनमार्त्यै जनवादिनँव्यृद्धर्याऽअपगल्भँ सँशराय प्रच्छिदम् ॥

बीभत्सायै। पौल्कसम्। वर्णाय। हिरण्यकारमिति हिरण्यऽकारम्। तुलायै। वाणिजम्। पश्चादोषायेति पश्चाऽदोषाय। ग्लाविनम्। विश्वेभ्यः। भूतेभ्यः। सिध्मलम्। भूत्यै। जागरणम्। अभूत्यै। स्वपनम्। आर्त्या इत्याऽऋत्यै। जनवादिनमिति जनऽवादिनम्। व्यृद्ध्या इति विऽऋध्यै। अपगल्भमित्यपऽगल्भम्। सꣳशरायेति सम्ऽशराय। प्रच्छिदमिति प्रऽच्छिदम्॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१२३. (बीभत्सायै) = हत्या आदि बीभत्स कार्यों के लिए (पौल्कसम्) = अन्त्यजजाति के व्यक्ति को प्राप्त करे। १२४. (वर्णाय) = सौन्दर्य निर्माण के लिए (हिरण्यकारम्) = सुवर्णकार को प्राप्त करे, वह सोने पर किस प्रकार चित्रकला द्वारा सौन्दर्य का उत्पादन करनेवाला होता है ? १२५. (तुलायै) = तुला के लिए, तोलने आदि के कार्यों के लिए (वाणिजम्) = वणिक्पुत्र [ बाणिया] को प्राप्त करे। १२६. (पश्चादोषाय) = पीछे दोष देने के लिए (ग्लाविनम्) = अहृष्ट, अशान्त को प्राप्त करे [ग्लै हर्षक्षये], अर्थात् अप्रसन्न रहने के स्वभाववाला व्यक्ति सदा पीठ पीछे दोषों का उद्घाटन करता है अथवा पश्चादोष [back biter] कभी प्रसन्न नहीं रह सकता। १२७. (विश्वेभ्यः भूतेभ्यः) = सब प्राणियों के हित के लिए (सिध्मलम्) = [सिध्मा: सुखसाधकाः विद्यन्ते यस्य तम् - द०] सुखसाधक पदार्थों से युक्त पुरुष को नियत करे। १२८. (भूत्यै जागरणम्) = कल्याण के लिए जागरण को प्राप्त करें, अर्थात् जागनेवाले का ही कल्याण होता है, ऐसा समझे । १२९. (अभूत्यै स्वपनम्) = यह भी स्पष्ट है कि सोना, सोते रहना, अपने भले को न सोचना, अकल्याण के लिए होता है। १३०. (आर्त्यै) = पीड़ा के लिए (जनवादिनम्) = इधर-उधर लोकनिन्दा फैलानेवाले को प्राप्त करे। १३१. (व्यृद्ध्यै) = असमृद्धि व दरिद्रता के लिए (अपगल्भम्) = प्रगल्भतारहित पुरुष को प्राप्त करे। राजा के मन्त्री प्रगल्भ व चतुर न होंगे तो कोश खाली हो जाएगा। प्रगल्भता के अभाव में गृहस्थ दरिद्र ही बना रहेगा। १३२. (संशराय) = उत्तमता से हिंसा के लिए (प्रच्छिदम्) = उत्तम छेदनकर्ता को प्राप्त करे, अर्थात् वधदण्ड के लिए छेदनक्रिया में निपुण व्यक्ति को नियत करे। में निपुण व्यक्ति की नियुक्ति करनी है।
Essence
भावार्थ - राष्ट्र में बीभत्स व छेदनादि कार्यों में निपुण व्यक्ति को नियत करे ।
Subject
बीभत्स के लिए पौल्कस को