Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 15

22 Mantra
30/15
Devata- राजेश्वरौ देवते Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- विराट् कृतिः Swara- निषादः
Mantra with Swara
य॒माय॑ यम॒सूमथ॑र्व॒भ्योऽव॑तोका संवत्स॒राय॑ पर्य्या॒यिणीं॑ परिवत्स॒रायावि॑जाता- मिदावत्स॒राया॒तीत्व॑रीमिद्वत्स॒राया॑ति॒ष्कद्व॑रीं वत्स॒राय॒ विज॑र्जरा संवत्स॒राय॒ पलि॑क्नीमृ॒भुभ्यो॑ऽ जिनस॒न्धꣳ सा॒ध्येभ्य॒श्चर्म॒म्नम्॥१५॥

य॒माय॑। य॒म॒सूमिति॑ यम॒ऽसूम्। अथ॑र्वभ्य॒ इत्यथ॑र्वऽभ्यः। अव॑तोका॒मित्यव॑ऽतोकाम्। सं॒व॒त्स॒राय॑। प॒र्य्या॒यिणी॑म्। प॒र्य्या॒यिनी॒मिति॒ परिऽआ॒यिनी॒॑म्। प॒रि॒व॒त्स॒रायेति॑ परिऽवत्स॒राय॑। अवि॑जाता॒मित्यवि॑ऽजाताम्। इ॒दा॒व॒त्स॒राय॑। अ॒तीत्व॑री॒मित्य॑ति॒ऽइत्व॑रीम्। इ॒द्व॒त्स॒रायेती॑त्ऽवत्स॒राय॑। अ॒ति॒ष्कद्व॑रीम्। अ॒ति॒स्कद्व॑री॒मित्य॑ति॒ऽस्कद्व॑रीम्। व॒त्स॒राय॑। विज॑र्जरा॒मिति॒ विऽज॑र्जराम्। सं॒व॒त्स॒राय॑। पलि॑क्नीम्। ऋ॒भुभ्य॒ इत्यृ॒भुऽभ्यः॑। अ॒जि॒न॒स॒न्धमित्य॑जिनऽस॒न्धम्। सा॒ध्येभ्यः॑। च॒र्म॒म्नमिति॑ चर्म॒ऽम्नम् ॥१५ ॥

Mantra without Swara
यमाय यमसूमथर्वभ्योवतोकाँ सँवत्सराय पर्यायिणीम्परिवत्सरायाविजातामिदावत्सरायातीत्वरीमिद्वत्सरायातिष्कद्वरीँवत्सराय विजर्जराँ सँवत्सराय पलिक्नीमृभुभ्यो जिनसंन्धँ साध्येभ्यश्चर्मम्नम् ॥

यमाय। यमसूमिति यमऽसूम्। अथर्वभ्य इत्यथर्वऽभ्यः। अवतोकामित्यवऽतोकाम्। संवत्सराय। पर्य्यायिणीम्। पर्य्यायिनीमिति परिऽआयिनीम्। परिवत्सरायेति परिऽवत्सराय। अविजातामित्यविऽजाताम्। इदावत्सराय। अतीत्वरीमित्यतिऽइत्वरीम्। इद्वत्सरायेतीत्ऽवत्सराय। अतिष्कद्वरीम्। अतिस्कद्वरीमित्यतिऽस्कद्वरीम्। वत्सराय। विजर्जरामिति विऽजर्जराम्। संवत्सराय। पलिक्नीम्। ऋभुभ्य इत्यृभुऽभ्यः। अजिनसन्धमित्यजिनऽसन्धम्। साध्येभ्यः। चर्मम्नमिति चर्मऽम्नम्॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१०१. (यमाय) = नियन्त्रण के लिए (यमसूम्) = नियमोपनियम बनानेवाली सभा को प्राप्त करे, आजकल की भाषा में 'विधान सभा' का निर्माण करे। १०२. (अथर्वभ्यः) = [न थर्वति ] स्थिरवृत्तिवाले लोगों के लिए, ध्यान के अभ्यासियों के लिए (अवतोकाम्) = रक्षक सेना को नियत करे। १०३. (संवत्सराय) = उत्तम निवास के लिए (पर्यायिणीम्) = क्रम को जाननेवाली को प्राप्त करे। वस्तुतः जो पत्नी 'किस क्रम में कार्य करने हैं' इस बात को समझती है, वह कार्यों को सुचारुरूपेण सम्पन्न कर पाती है। १०४. (परिवत्सराय) = पूर्ण निवास के लिए, एक-एक कोश में उत्तम निवास के लिए (अविजाताम्) = ब्रह्मचारिणी [ अ-विजात] को प्राप्त करे, अर्थात् गृहस्थ में आने से पहले इस बात का ध्यान किया जाए कि ब्रह्मचारिणी ने सब कोशों का विकास उत्तमता से किया है। १०५. (इदावत्सराय) = वर्त्तमान काल में निवास के लिए (अतीत्वरीम्) = अतिशयेन क्रियाशील को प्राप्त करे। जो क्रियाशील नहीं होती वह या तो भूतकाल की उज्ज्वलता का गान करती रहती है या भविष्यत् के स्वप्न लेती रहती है। १०६. (इद्वत्सराय) = निश्चयात्मक निवास के लिए, असंशयात्मा होकर जीवन को चलाने के लिए (अतिष्कद्वरीम्) = अतिशय ज्ञानवाली [स्कन्द गति - ज्ञान] को प्राप्त करे। ज्ञान ही मनुष्य को संशय से ऊपर उठानेवाला है। १०७. (वत्सराय) = उत्तम निवास के लिए (विजर्जराम्) = [विगतजर्जराम्] अशिथिल शरीरवाली को नियत करे। शिथिल शरीरवाली से निवास के लिए आवश्यक कर्मों को करना सम्भव नहीं होता । १०८. (संवत्सराय) = उत्तम निवास के लिए (पलिक्नीम्) = श्वेत केशोंवाली, अर्थात् अनुभव-सम्पन्न महिला को नियत करे। १०९. (ऋभुभ्यः) = शिल्पियों के लिए, रथ आदि का निमार्ण करनेवालों के लिए वहाँ घर में उत्तम निवास के लिए कार्यों के क्रम को सम्यक् समझनेवाली पत्नी का होना आवश्यक है। (अजिनसन्धम्) = चर्म के सन्धाता को नियत करे। इन दोनों का परस्पर सम्मिलित कार्य होने पर ही रथ आदि का ठीक से निर्माण हो सकेगा। रथकार उपस्थ = Seat आदि बनाएगा. तो उनपर गद्दी आदि को यह अजिनसन्धाता जमाएगा। ११०. (साध्येभ्यः) = अपूर्ण पदार्थों को पूर्ण बनानेवालों के लिए [Finishing touches] देनेवालों के लिए (चर्मम्नम्) = चमड़ा कमानेवाले [Leather tanner] को नियत करे । 'साध्य रथ की कमी को दूर करेगा तो यह 'चर्मम्न' चमड़े की कमी को दूर करेगा और इस प्रकार ये दोनों मिलकर रथ को पूर्ण ठीक कर देंगे ।
Essence
भावार्थ- जहाँ राष्ट्र का उत्तम सञ्चालन, व्यवस्थापिका, सभादि के होने से होता है । वहां घर में उत्तम निवास के लिए कार्यों के क्रम को सम्यक् समझनेवाली पत्नी का होना आवश्यक है ।
Subject
यम के लिए यमसू को