Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 10

22 Mantra
30/10
Devata- विद्वान् देवता Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- भुरिगत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उ॒त्सा॒देभ्यः॑ कु॒ब्जं प्र॒मुदे॑ वाम॒नं द्वा॒र्भ्यः स्रा॒म स्वप्ना॑या॒न्धमध॑र्माय बधि॒रं प॒वित्रा॑य भि॒षजं॑ प्र॒ज्ञाना॑य नक्षत्रद॒र्शमा॑शि॒क्षायै॑ प्र॒श्निन॑मुपशि॒क्षाया॑ऽअभिप्र॒श्निनं॑ म॒र्यादा॑यै प्रश्नविवा॒कम्॥१०॥

उ॒त्सा॒देभ्य॒ इत्यु॑त्ऽसा॒देभ्यः॑। कु॒ब्जम्। प्र॒मुद॒ इति॑ प्र॒ऽमुदे॑। वा॒म॒नम्। द्वा॒र्भ्य इति॑ द्वाः॒ऽभ्यः। स्रा॒मम्। स्वप्ना॑य। अ॒न्धम्। अध॑र्माय। ब॒धि॒रम्। प॒वित्रा॑य। भि॒षज॑म्। प्र॒ज्ञाना॒येति॑ प्र॒ऽज्ञाना॑य। न॒क्ष॒त्र॒द॒र्शमिति॑ नक्षत्रऽद॒र्शम्। आ॒शि॒क्षाया॒ इत्या॑ऽशि॒क्षायै॑। प्र॒श्निन॑म्। उ॒प॒शि॒क्षाया॒ इत्यु॑पऽशि॒क्षायै॑। अ॒भि॒प्र॒श्निन॒मित्य॑भिऽप्रश्निन॑म्। म॒र्यादा॑यै। प्र॒श्न॒वि॒वा॒कमिति॑ प्रश्नऽविवा॒कम् ॥१० ॥

Mantra without Swara
उत्सादेभ्यः कुब्जम्प्रमुदे वामनन्द्वार्भ्यः स्रामँ स्वप्नायान्धमर्धमाय बधिरम्पवित्राय भिषजञ्प्रज्ञानाय नक्षत्रदर्शमाशिक्षायै प्रश्निनमुपशिक्षायाऽअभिप्रश्निनम्मर्यादायै प्रश्नविवाकम् ॥

उत्सादेभ्य इत्युत्ऽसादेभ्यः। कुब्जम्। प्रमुद इति प्रऽमुदे। वामनम्। द्वार्भ्य इति द्वाःऽभ्यः। स्रामम्। स्वप्नाय। अन्धम्। अधर्माय। बधिरम्। पवित्राय। भिषजम्। प्रज्ञानायेति प्रऽज्ञानाय। नक्षत्रदर्शमिति नक्षत्रऽदर्शम्। आशिक्षाया इत्याऽशिक्षायै। प्रश्निनम्। उपशिक्षाया इत्युपऽशिक्षायै। अभिप्रश्निनमित्यभिऽप्रश्निनम्। मर्यादायै। प्रश्नविवाकमिति प्रश्नऽविवाकम्॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
५१. (उत्सादेभ्यः) = विनाशकारी कार्यों के लिए (कुब्जम्) = कुबड़े को नियत करे। इन लोगों की बुद्धि निर्माण की अपेक्षा विनाश में अधिक चलती है। कुब्ज का शब्दार्थ है- 'कुत्सितं उब्जति ' = बुरे ढंग से दबाव [ Subdue] में रखता है ५२. (प्रमुदे वामनम्) = विनोदकारी कार्यों के लिए बौने पुरुष को प्राप्त करे। बौने पुरुष को देखकर ही कुछ अजीब-सा प्रतीत होने लगता है। इनमें अपने कद की कमी को प्रतितुलित करने के लिए हास्य आदि की शक्ति अधिक होती है । ५३. (द्वार्थ्य:) = द्वारों की रक्षा के लिए (स्स्रामम्) = जल से क्लिन्न आँखोंवाले को प्राप्त करे। द्वारपाल के स्थान पर नाम की नियुक्ति करे न कि स्नेहशून्य आँखोंवाले की। ५४. (स्वप्नाय) = नींद के लिए (अन्धम्) = लोचनहीन को नियुक्त करें, अर्थात् जिस जगह केवल सोने का कार्य हो वहाँ नेत्रहीन पुरुष की नियुक्ति कर दे, चूँकि यह सोने के कार्य को सम्यक् पूर्ण कर सकेगा । ५५. (अधर्माय) = अधर्म के लिए (बधिरम्) = बहिरे को प्राप्त करे। जो बड़ों की प्रेरणा को नहीं सुनता [Turns a deaf ear to them] वह अधर्म के मार्ग की ओर चला ही जाता है। शास्त्रश्रवण करनेवाला व्यक्ति ही धर्म के मार्ग पर चल पाता है । ५६. (पवित्राय भिषजम्) = पवित्रता के लिए वैद्य को नियत करे। इसका कार्य जहाँ सफाई का ध्यान करना होगा, वहाँ बीमारियों को न फैलने देने तथा मानस पवित्रता उत्पन्न करने का भी ध्यान करना होगा । ५७. (प्रज्ञानाय) = प्रकृष्ट ज्ञान के लिए (नक्षत्रदर्शम्) = नक्षत्रों का दर्शन करनेवाले को, अर्थात् गणित ज्योतिष के पण्डित को नियुक्त करे। यह उन तारों की गति में भी प्रभु की महिमा को देखता है, इसे तारे प्रभु का स्तवन करते प्रतीत होते हैं। यह इन नक्षत्रों की विद्या का अध्ययन करता हुआ प्रभु का ज्ञान प्राप्त करता है । ५८. (आशिक्षायै प्रश्निनम्) = सब विषयों का ज्ञान देने के लिए विविध प्रश्न करनेवाले अध्यापक को प्राप्त करे। वस्तुतः इस प्रश्नात्मक शैली [ Questioning method] के द्वारा आचार्य विद्यार्थी के अन्दर से ही ज्ञान को बाहर लाने का प्रयत्न करता है। ५९. (उपशिक्षायै) = उपशिक्षा के लिए, अर्थात् Training के लिए (अभिप्रश्निनम्) = नाना प्रकार के प्रश्न पूछनेवाले को नियत करे। उन भावी शिक्षकों को प्रश्न पूछने का प्रकार भी तो सिखाना ही है। ६०. (मर्यादायै) = मर्यादा के लिए (प्रश्नविवाकम्) = न्यायाधीश को नियत करे। यह अपराधियों को उचित दण्ड देते हुए कुप्रवृत्तियों का दमन करता है और इस प्रकार मर्यादा की स्थापना करता है।
Essence
भावार्थ - राजा शिक्षा के प्रसार के लिए ऐसे अध्यापकों को नियत करे जो विद्यार्थियों के ज्ञान को प्रश्नात्मक शैली से निरन्तर बढ़ानेवाले हों ।
Subject
विनाश कार्यों के लिए