Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 1

22 Mantra
30/1
Devata- सविता देवता Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
देव॑ सवितः॒ प्र सु॑व य॒ज्ञं प्र सु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य।दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः॑ के॑त॒पू केतं॑ नः पुनातु वा॒चस्पति॒र्वाचं॑ नः स्वदतु॥१॥

देव॑। स॒वि॒त॒रिति॑ सवितः। प्र। सु॒व॒। य॒ज्ञम्। प्र। सु॒व॒। य॒ज्ञप॑तिमिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिम्। भगा॑य। दि॒व्यः। ग॒न्ध॒र्वः। के॒त॒पूरिति॑ केत॒ऽपूः। केत॑म्। नः॒। पु॒ना॒तु॒। वा॒चः। पतिः॑। वाच॑म्। नः॒। स्व॒द॒तु॒ ॥१ ॥

Mantra without Swara
देव सवितः प्रसुव यज्ञम्प्र सुव यज्ञपतिम्भगाय । दिव्यो गन्धर्वः केतुपूः केतन्नः पुनातु वाचस्पतिर्वाजन्नः स्वदतु ॥

देव। सवितरिति सवितः। प्र। सुव। यज्ञम्। प्र। सुव। यज्ञपतिमिति यज्ञऽपतिम्। भगाय। दिव्यः। गन्धर्वः। केतपूरिति केतऽपूः। केतम्। नः। पुनातु। वाचः। पतिः। वाचम्। नः। स्वदतु॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (देव) = सब दिव्य गुणों के पुञ्ज तथा (सवितः) = सकल जगदुत्पादक तथा सब प्रेरणाओं के देनेवाले प्रभो! (यज्ञम् प्रसुव) = हमें यज्ञ की प्रेरणा दीजिए। प्रेरणा देने का अधिकार तभी प्राप्त होता है जब वे गुण स्वयं हममें हों। इसी दृष्टिकोण से यहाँ 'देव सवित:' इस क्रम से शब्दों का प्रयोग है। प्रभु स्वयं दिव्य गुणोंवाले हैं, दिव्य गुणों के पुञ्ज हैं, वे हृदयस्थरूपेण जीव को प्रेरणा प्राप्त कराते हैं। प्रभु स्वयं सृष्टिरूप महान् यज्ञ करनेवाले हैं, वे प्रभु हमें भी यज्ञ की प्रेरणा प्राप्त कराएँ । २. हे प्रभो! (यज्ञपतिम्) = यज्ञों के पति, यज्ञों के रक्षक मुझे (भगाय) = ऐश्वर्य के लिए (प्रसुव) = प्रेरित कीजिए, अर्थात् मुझे ऐश्वर्य प्राप्त कराइए। मैं यज्ञशील बनकर ऐश्वर्य को प्राप्त करनेवाला बनूँ। ३. हे प्रभो! आप दिव्यः सदा प्रकाश में निवास करनेवाले हैं, (गन्धर्वः) = [गां धरति] वेदवाणी का धारण करनेवाले हैं, (केतपू:) = हमारे ज्ञानों को पवित्र करनेवाले हैं। आपकी कृपा से आपका उपासक 'दिव्य, गन्धर्व, केतपू:' विद्वान् (नः) = हमारे (केतम्) - ज्ञान को (पुनातु) = पवित्र करे। हमें प्रकाश में निवास करनेवाले, वेदवाणी के धारक, ज्ञान को पवित्र करनेवाले आचार्य प्राप्त हों. उनके सम्पर्क से हमारा ज्ञान चमक उठे। ४. (वाचस्पतिः) = सब वाणियों का स्वामी व रक्षक प्रभु (नः) = हमारी (वाचम्) = वाणी को (स्वदतु) = स्वादवाला बनाए। हमारी वाणी में माधुर्य हो । ५. ज्ञानी व मधुर वाणीवाले बनकर हम यज्ञियवृत्ति से अधिक-से-अधिक लोकहित में प्रवृत्त हों और दुःखी मनुष्य-समूह का कल्याण करते हुए प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि 'नारायण' बनें, नरसमूह के शरणस्थान।
Essence
भावार्थ- प्रभु हमें यज्ञ की प्रेरणा दें। यज्ञपति बनकर हम ऐश्वर्यशाली हों। प्रभु हमारे ज्ञान को पवित्र करें और वाणी को माधुर्य से भर दें।
Subject
ज्ञान+वाङमाधुर्य