Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 63

63 Mantra
3/63
Devata- रुद्रो देवता Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- भूरिक् जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
शि॒वो नामा॑सि॒ स्वधि॑तिस्ते पि॒ता नम॑स्तेऽअस्तु॒ मा मा॑ हिꣳसीः। निव॑र्त्तया॒म्यायु॑षे॒ऽन्नाद्या॑य प्र॒जन॑नाय रा॒यस्पोषा॑य सुप्रजा॒स्त्वाय॑ सु॒वीर्या॑य॥६३॥

शि॒वः। नाम॑। अ॒सि॒। स्वधि॑ति॒रिति॒ स्वऽधि॑तिः। ते॒। पि॒ता। नमः॑। ते॒। अ॒स्तु॒। मा। मा॒। हि॒ꣳसीः॒। नि। व॒र्त्त॒या॒मि॒। आ॑युषे। अ॒न्नाद्या॒येत्य॑न्न॒ऽअ॒द्याय॑। प्र॒जन॑ना॒येति प्र॒ऽजन॑नाय। रा॒यः। पोषा॑य। सु॒प्र॒जा॒स्त्वायेति॑ सुप्रजाः॒ऽत्वाय॑। सु॒वीर्य्या॒येति॑ सु॒ऽवीर्य्या॑य ॥६३॥

Mantra without Swara
शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मा मा हिँसीः । निवर्त्तयाम्युषे न्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय ॥

शिवः। नाम। असि। स्वधितिरिति स्वऽधितिः। ते। पिता। नमः। ते। अस्तु। मा। मा। हिꣳसीः। नि। वर्त्तयामि। आयुषे। अन्नाद्यायेत्यन्नऽअद्याय। प्रजननायेति प्रऽजननाय। रायः। पोषाय। सुप्रजास्त्वायेति सुप्रजाःऽत्वाय। सुवीर्य्यायेति सुऽवीर्य्याय॥६३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का नारायण ही प्रार्थना करता है— १. ( शिवो नाम असि ) = आप शिव नामवाले हैं, सभी का कल्याण करनेवाले हैं। 

२. ( ते ) = आपका ( स्वधितिः ) = अपना धारण स्वयं है। आपका धारण करनेवाला कोई और नहीं है। 

३. ( पिता ) = आप हम सबके पिता = पालन करनेवाले हैं। ( नमः ते अस्तु ) = हम आपके प्रति नतमस्तक होते हैं। 

४. ( मा मा हिंसीः ) = आप मुझे हिंसित मत करें। मैं कभी आपके क्रोध का पात्र न होऊँ। अपने उत्तम आचरणों से आपकी कृपादृष्टि ही प्राप्त करूँ। 

५. ( निवर्तयामि ) = निश्चय से मैं प्रत्येक कार्य में आपको वर्त्तता हूँ। ‘मेरे जीवन में आप अनावश्यक हों’ यह बात नहीं। मेरा तो प्रत्येक कार्य आपके स्मरण के साथ होता है। क्यों ? [ क ] ( आयुषे ) = उत्तम आयुष्य के लिए। आपके स्मरण से मेरा जीवन उत्तम बनता है। [ ख ] ( अन्नाद्याय ) = आद्य अन्न के लिए। मैं सात्त्विक अन्न का ही सेवन करता हूँ। आपका स्मरण करते हुए मांसादि भोजनों का प्रसङ्ग नहीं हो सकता। [ ग ] ( प्रजननाय ) = प्रकृष्ट विकास के लिए। आपके स्मरण से अवनति की ओर न जाकर मैं उन्नति की ओर ही चलता हूँ। [ घ ] ( रायस्पोषाय ) = धन के पोषण के लिए। प्रभु-स्मरण से हम सुपथ से उत्तम धन कमानेवाले बनते हैं। [ ङ ] ( सुप्रजास्त्वाय ) = उत्तम सन्तान के लिए। प्रभु को न भूलनेवाले पति-पत्नी सदा उत्तम सन्तानों को प्राप्त करते हैं। [ च ] ( सुवीर्याय ) = उत्तम वीर्य के लिए। प्रभु-स्मरण वासना को दूर भगाता है और मनुष्य वासना से ऊपर उठने के कारण वीर्यरक्षा करने में समर्थ हो पाता है। इसके वीर्य में वासनाङ्गिन उबाल नहीं लाती। 

६. यह सुवीर्य नारायण ही वस्तुतः नारायण बनता है, लोगों का शरणस्थान बनने के योग्य होता है।
Essence
भावार्थ — ‘नारायण’ प्रभु का स्मरण करता है और लोकहित के कार्यों में लगा रहता है। यह लोकहित का कार्य ही ‘सर्वमहान् यज्ञ’ है।
Subject
प्रभु का क्रियात्मक चिन्तन [ वर्तन ]