Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 60

63 Mantra
3/60
Devata- रुद्रो देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- विराट् ब्राह्मी अनुष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्र्य॑म्बकं यजामहे सुग॒न्धिं पु॑ष्टि॒वर्ध॑नम्। उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ माऽमृता॑त्। त्र्य॑म्बकं यजामहे सुग॒न्धिं प॑ति॒वेद॑नम्। उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नादि॒तो मु॑क्षीय॒ मामुतः॑॥६०॥

त्र्य॑म्बक॒मिति॒ त्रिऽअ॑म्बकम्। य॒जा॒म॒हे॒। सु॒ग॒न्धिमिति॑ सुऽग॒न्धिम्। पु॒ष्टि॒वर्ध॑न॒मिति॑ पुष्टि॒ऽवर्ध॑नम्। उ॒र्वा॒रु॒कमि॒वेत्यु॑र्वारु॒कम्ऽइ॑व। बन्ध॑नात्। मृ॒त्योः। मु॒क्षी॒य॒। मा। अ॒मृता॑त्। त्र्य॑म्बक॒मिति॒ त्रिऽअ॑म्बकम्। य॒जा॒म॒हे॒। सु॒ग॒न्धिमिति॑ सुऽग॒न्धिम्। प॒ति॒वेद॑न॒मिति॑ पति॒ऽवेद॑नम्। उ॒र्वा॒रु॒कमि॒वेत्यु॑र्वारु॒कम्ऽइ॑व। बन्ध॑नात्। इ॒तः। मु॒क्षी॒य॒। मा। अ॒मु॒तः॑ ॥६०॥

Mantra without Swara
त्र्यम्बकँयजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् । त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः ॥

त्र्यम्बकमिति त्रिऽअम्बकम्। यजामहे। सुगन्धिमिति सुऽगन्धिम्। पुष्टिवर्धनमिति पुष्टिऽवर्धनम्। उर्वारुकमिवेत्युर्वारुकम्ऽइव। बन्धनात्। मृत्योः। मुक्षीय। मा। अमृतात्। त्र्यम्बकमिति त्रिऽअम्बकम्। यजामहे। सुगन्धिमिति सुऽगन्धिम्। पतिवेदनमिति पतिऽवेदनम्। उर्वारुकमिवेत्युर्वारुकम्ऽइव। बन्धनात्। इतः। मुक्षीय। मा। अमुतः॥६०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( त्र्यम्बकम् ) = ‘ऋग्यजुःसाम’ मन्त्रों के द्वारा ज्ञान-कर्म व भक्ति का उपदेश देनेवाले प्रभु का ( यजामहे ) = हम पूजन करते हैं अथवा प्रभु को अपने साथ सङ्गत करते हैं [ यज् सङ्गतीकरण ] 

२. वस्तुतः ( सुगन्धिम् ) = वे प्रभु ही हमारे साथ उत्तम गन्ध = सम्बन्धवाले हैं। संसार के अन्य सब व्यक्तियों के सम्बन्ध में कुछ स्वार्थ है, प्रभु का सम्बन्ध स्वार्थ के लेश से भी शून्य है। 

३. जितना-जितना प्रभु के साथ हमारा सम्बन्ध बढ़ता है उतना-उतना ही ये प्रभु ( पुष्टिवर्धनम् ) = हमारी पुष्टि का वर्धन करनेवाले हैं। 

४. वसिष्ठ इस प्रभु से प्रार्थना करता है कि प्रभु के सम्पर्क से पुष्टि को प्राप्त होता हुआ मैं पूर्णतः परिपक्व होकर ( मृत्योः ) = इस मरणधर्मा शरीर से ( मुक्षीय ) = इस प्रकार मुक्त हो जाऊँ ( इव ) = जैसे पूर्ण परिपक्व हुआ-हुआ ( उर्वारुकम् ) = खीरा ( बन्धनात् ) = बन्धन से मुक्त हो जाता है। [ वृन्तं प्रसवबन्धनम् ] जैसे पूर्ण परिपक्व हुआ कोई भी फल या फूल उसे शाखा से बाँधनेवाले वृक्ष से अलग हो जाता है, उसी प्रकार मैं पूर्ण पुष्टि को प्राप्त हुआ, मृत्यु से दूर हो जाऊँ और अमरता का लाभ करूँ। 

५. ( मा अमृतात् ) = मैं मोक्ष से छूटनेवाला न होऊँ। इसी प्रार्थना को वसिष्ठ पुनः दुहराता है कि—

१. ( त्र्यम्बकम् ) = ज्ञान-कर्म व भक्ति के उपदेष्टा प्रभु की ( यजामहे ) = हम उपासना करते हैं। 

२. वे प्रभु ही ( सुगन्धिम् ) = हमारे उत्कृष्ट सम्बन्धवाले हैं। 

३. ये प्रभु ही ( पतिवेदनम् ) = मुझे सच्चे पति—रक्षक को [ विद् लाभे ] प्राप्त करानेवाले हैं। वस्तुतः ये प्रभु ही मेरे सच्चे पति हैं। जीवात्मा पत्नी है, प्रभु पति हैं। पत्नी ने पति को प्राप्त करना है। उपासना ही उस प्राप्ति का उपाय है। 

४. परन्तु यह उपासन व पतिवेदन इस संसार को छोड़कर ही होगा। कन्या भी पूर्वगृह को छोड़कर ‘पतिगृह’ को प्राप्त करती है, अतः वसिष्ठ प्रार्थना करता है कि जैसे एक कन्या ( बन्धनात् ) = नाना प्रकार के आकर्षणों व बन्धनों से बाँधनेवाले पितृगृह से इस प्रकार शान्ति से जाती है ( इव ) = जैसे कि ( उर्वारुकं बन्धनात् ) = एक परिपक्व फल अपने शाखा-बन्धन से अलग हो जाता है। इसी प्रकार मैं ( इतः ) = इस संसार-बन्धन से ( मुक्षीय ) = छूट जाऊँ। 

५. ( मा अमुतः ) = इस संसार से परे उस प्रभु के सम्बन्ध से मैं कभी पृथक् न होऊँ। मैं अपने वास्तविक सम्बन्ध को पहचानूँ और उसे ही अपनाऊँ।
Essence
भावार्थ — प्रभु हमें ‘ज्ञान-कर्म-भक्ति’ का उपदेश देते हैं। वही हमारे सच्चे सम्बन्धी हैं । वे ही हमें पुष्ट करनेवाले या हमारे रक्षक हैं। मैं इस संसार-बन्धन से छूटकर प्रभु को ही प्राप्त करनेवाला बनूँ।
Subject
मृत्युञ्जय मन्त्र, वसिष्ठ का निश्चय