Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 6

63 Mantra
3/6
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सर्प्पराज्ञी कद्रूर्ऋषिः Chhand- निचृत् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन् मा॒तरं॑ पु॒रः। पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्वः॑॥६॥

आ। अ॒यम्। गौः। पृश्निः॑। अ॒क्र॒मी॒त्। अस॑दत्। मा॒तर॑म्। पु॒रः। पि॒तर॑म्। च॒। प्र॒यन्निति॑ प्र॒ऽयन्। स्व॒रिति॒ स्वः᳕ ॥६॥

Mantra without Swara
आयङ्गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरम्पुरः पितरञ्च प्रयन्त्स्वः ॥

आ। अयम्। गौः। पृश्निः। अक्रमीत्। असदत्। मातरम्। पुरः। पितरम्। च। प्रयन्निति प्रऽयन्। स्वरिति स्वः॥६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ‘प्रजापति’ ने गत मन्त्र में अपने जीवन को यज्ञमय बनाया। यज्ञादि उत्तम कर्मों में सदा लगे रहने से यह ‘सर्प’ = गतिशील [ सृप् गतौ ] कहलाया। क्रियाशीलता से चमकने के कारण यह ‘राज्ञी’ [ राज् दीप्तौ ] कहलाता है। इस प्रकार यह क्रियाशील व देदीप्यमान जीवनवाला बनकर ‘कं प्रति द्रवति’ उस आनन्दस्वरूप प्रभु की ओर निरन्तर बढ़ रहा है। अतः ‘कद्रूः’ है। ‘सर्पराज्ञी कद्रूः’ यह स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग इसलिए है कि जीव मानो पत्नी है, जोकि अपने प्रभुरूप पति का वरण करने के लिए सन्नद्ध है।

२. ( आयम् ) = यह जीव ( गौः ) = गतिशील है [ गच्छति ], निरन्तर क्रिया में लगा हुआ है। ( पृश्निः ) = [ संस्प्रष्टा भासां ] ज्योतियों को यह स्पर्श करनेवाला है। इसकी क्रिया के साथ ज्ञान जुड़ा हुआ है, वस्तुतः इसकी प्रत्येक क्रिया ज्ञानपूर्वक ही होती है। ( अक्रमीत् ) = यह निरन्तर उन्नति-पथ पर पग रख रहा है, आगे और आगे बढ़ रहा है। ( पुरः ) = सबसे पहले यह ( मातरम् ) = वेदमाता को [ स्तुता मया वरदा वेदमाता० ] ( असदत् ) = प्राप्त होता है। इसका सर्वप्रथम कार्य वेदज्ञान को प्राप्त करना है। इसे यह सर्वप्रधान कर्त्तव्य समझता है। इसी से तो वह कण-कण में प्रभु का दर्शन करता है। ( स्वः ) = उस स्वयंप्रकाश ( पितरम् ) = पिता की ओर ( प्रयन् ) = जाने के हेतु से वह ऐसा करता है। वस्तुतः प्रभु का दर्शन तभी होता है जब मनुष्य इस वेदज्ञान से अपने ‘ब्रह्मवर्चस्’ को बढ़ाता है।
Essence
भावार्थ — हम वेदमाता को अपनाएँ, जिससे उस देदीप्यमान पिता—प्रभु का दर्शन कर सकें।
Subject
माता-पिता, सर्पराज्ञी कद्रूः