Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 59

63 Mantra
3/59
Devata- रुद्रो देवता Rishi- बन्धुर्ऋषिः Chhand- स्वराट् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
भे॒ष॒जम॑सि भेष॒जं गवेऽश्वा॑य॒ पुरु॑षाय भेष॒जम्। सु॒खं मे॒षाय॑ मे॒ष्यै॥५९॥

भे॒ष॒जम्। अ॒सि॒। भे॒ष॒जम्। गवे॑। अश्वा॑य। पुरु॑षाय। भे॒ष॒जम्। सु॒खमिति॑ सु॒ऽखम्। मे॒षाय॑। मे॒ष्यै ॥५९॥

Mantra without Swara
भेषजमसि भेषजङ्गवे श्वाय पुरुषाय भेषजम् । सुखम्मेषाय मेष्यै ॥

भेषजम्। असि। भेषजम्। गवे। अश्वाय। पुरुषाय। भेषजम्। सुखमिति सुऽखम्। मेषाय। मेष्यै॥५९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में वर्णन है कि प्रभु के द्वारा हम अपने सब दोषों का क्षय कराते हैं। एवं, प्रभु की उपासना ‘दोषराशिनाशनी’ है। दूसरे शब्दों में वह ‘भेषज’ है। इसी भावना से प्रस्तुत मन्त्र का प्रारम्भ होता है। हे प्रभो ! आप ( भेषजम् असि ) = औषध हो। ‘भेषं रोगं जयति’ हमारे सब रोगों को विजय करनेवाले हो। रोगों को समाप्त करके आप हमें नीरोग बनाते हो। 

२. हमें ही क्या! ( भेषजं गवे ) = हमारे घर की गौवों को भी नीरोग बनाते हो। इन नीरोग गायों के दुग्धसेवन से हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ [ गावः ] भी उत्तम बनती हैं, वे निर्दोष होती हैं। 

३. [ भेषजम् ] ( अश्वाय ) = हमारे घोड़ों के लिए भी आप भेषज हो। इन नीरोग व सबल घोड़ों पर आरुढ़ होकर भ्रमण के लिए जाते हुए हम अपनी सब कर्मेन्द्रियों को सबल बना पाते हैं। [ अथवा कर्मेन्द्रियाणि अश्नुवते कर्मसु ]। 

४. ( पुरुषाय भेषजम् ) = हे प्रभो! आप पुरुष के लिए ‘भेषज’ हो। जो पौरुषवाला होता है उसके भय को आप दूर करते हो [ भेषृ भये ]। 

५. हे प्रभो! आप ( भेषजं मेषाय मेष्यै ) = भेड़ व भेड़ी के लिए भी सुख देनेवाले हो। स्वस्थ भेड़ों से हमें अपने शीत-निवारण के लिए ऊन के वस्त्र प्राप्त होते हैं। 

६. यहाँ कपास-वस्त्रों का संकेत नहीं है, क्योंकि वे कपड़े पशुओं से प्राप्त नहीं होते। यहाँ पशुओं का क्रम होने से कपास का उल्लेख नहीं है। वैदिक संस्कृति में कपास के वस्त्रों का उल्लेख है ही कम। 

७. यहाँ बन्धु की प्रार्थना समाप्त होती है। यह ‘बन्धु’ सब इन्द्रियों को मन द्वारा और मन को प्राणसाधना द्वारा बाँधकर उस प्रभु में बाँधता है। इस बाँधने से ही यह ‘बन्धु’ कहलाता था। अब पूर्ण रूप से बाँधकर वह वसिष्ठ = वशियों में श्रेष्ठ’ बन जाता है। और वसिष्ठ ही अगले मन्त्र में प्रभु से प्रार्थना करता है।
Essence
भावार्थ — प्रभो! आप भेषज हैं। आप हमें और हमारे गौ, घोड़े, भेड़, बकरी आदि पशुओं को नीरोग बनाइए।
Subject
भेषज