Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 56

63 Mantra
3/56
Devata- सोमो देवता Rishi- बन्धुर्ऋषिः Chhand- गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
व॒यꣳ सो॑म व्र॒ते तव॒ मन॑स्त॒नूषु॒ बिभ्र॑तः। प्र॒जाव॑न्तः सचेमहि॥५६॥

व॒यम्। सो॒म॒। व्र॒ते। तव॑। मनः॑। त॒नूषु॑। बिभ्र॑तः। प्र॒जाव॑न्त॒ इति॑ प्रजाऽव॑न्तः। स॒चे॒म॒हि॒ ॥५६॥

Mantra without Swara
वयँ सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः । प्रजावन्तः सचेमहि ॥

वयम्। सोम। व्रते। तव। मनः। तनूषु। बिभ्रतः। प्रजावन्त इति प्रजाऽवन्तः। सचेमहि॥५६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में ‘व्रतमय जीवन’ की चर्चा थी। इस व्रत को प्रस्तुत मन्त्र में ‘सोम का व्रत’ कहा है। सोम के दो अर्थ हैं—[ क ] वीर्यशक्ति [ ख ] परमात्मा। वीर्यरक्षा के द्वारा ज्ञानाङ्गिन को समिद्ध करके ही हमें सूक्ष्म बुद्धि से उस प्रभु का दर्शन करना है ‘दृश्यते त्वग्य्राया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः’। हे ( सोम ) = शान्त प्रभो! ( वयम् ) = हम ( तव व्रते ) = तेरे व्रत में स्थित हुए, अर्थात् तेरी प्राप्ति के लिए ( सोम ) = वीर्य की रक्षा का पूर्ण ध्यान करते हुए ( मनः ) = अपने मन को ( तनूषु ) = शरीरों में ही ( बिभ्रतः ) = धारण करते हुए, अर्थात् मनों को इधर- उधर न भटकने देते हुए, भटकना तो क्या उसे शरीरों की शक्तियों के विस्तार [ तत् ] में लगाते हुए ( प्रजावन्तः ) = उत्तम प्रजाओंवाले अथवा उत्तम विकासवाले हम ( सचेमहि ) = आपका उपासन करते हैं। प्रभु के उपासन का क्रम यही है कि— १. हम सोम का व्रत धारण करें। ‘हमें प्रभु को पाना है’, ऐसा निश्चय करें और शरीर में सोम = वीर्य की रक्षा करें। 

२. मन को शरीर में ही धारण करें, इधर-उधर भटकने न दें। वह स्थूल, सूक्ष्म व कारणशरीर की शक्तियों के विकास में ही लगा रहे। 

३. हम उत्तम प्रजावाले बनें। साथ ही हम प्रजा अर्थात् उत्कृष्ट विकासवाले हों। हम अपने में सात्त्विक शक्तियों का विकास करनेवाले बनें।
Essence
भावार्थ — हमारा मन सोम के व्रत में स्थित हो। यह इधर-उधर भटके नहीं। हम प्रकृष्ट विकासवाले  हों।
Subject
सोम का व्रत [ ब्रह्मचर्य ]