Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 51

63 Mantra
3/51
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- विराट् पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अक्ष॒न्नमी॑मदन्त॒ ह्यव॑ प्रि॒याऽअ॑धूषत। अस्तो॑षत॒ स्वभा॑नवो॒ विप्रा॒ नवि॑ष्ठया म॒ती योजा॒ न्विन्द्र ते॒ हरी॑॥५१॥

अक्ष॑न्। अमी॑मदन्त। हि। अव॑। प्रि॒याः। अ॒धू॒ष॒त॒। अस्तो॑षत। स्वभा॑नव॒ इति॑ स्वऽभा॑नवः। विप्राः॑। नवि॑ष्ठया। म॒ती। योज॑। नु। इ॒न्द्र॒। ते॒। हरी॒ऽइति॒ हरी॑ ॥५१॥

Mantra without Swara
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा निविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ॥

अक्षन्। अमीमदन्त। हि। अव। प्रियाः। अधूषत। अस्तोषत। स्वभानव इति स्वऽभानवः। विप्राः। नविष्ठया। मती। योज। नु। इन्द्र। ते। हरीऽइति हरी॥५१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र का ‘और्णवाभ’ यज्ञों के जाल को तनता हुआ ‘गोतम’ बन जाता है। ‘अत्यन्त प्रशस्त इन्द्रियोंवाला’ [ गावः इन्द्रियाणि, तम = अतिशये ]। ये उत्तम इन्द्रियोंवाले लोग ( अक्षन् ) = [ घस् अदने ] उत्तम वानस्पतिक भोजन करते हैं। ‘अक्षन्’ शब्द में ‘घस्’ धातु घास व वनस्पति भोजन का संकेत करती है। 

२. ये ( अमीमदन्त ) = एकदम सादा भोजन करते हुए उसी में आनन्द का अनुभव करते हैं। 

३. ( हि ) = निश्चय से ( प्रियाः ) = सबके साथ प्रीतिपूर्वक वर्त्तनेवाले ये लोग ( अव अधूषत ) = सब वासनाओं को कम्पित करके अपने से दूर रखते हैं। इनका जीवन वासनामय नहीं होता। वानस्पतिक भोजन व प्रसन्न मनोवृत्ति ये दोनों बातें वासनाओं से बचने में सहायक होती हैं। 

४. वासनाओं को दूर रखने के उद्देश्य से ही ये ( अस्तोषत् ) = प्रभु का स्तवन करते हैं। 

५. इस प्रभु-स्तवन के कारण इनके जीवन में एक दिन वह आता है जब ये ( स्वभानवः ) = आत्मा की दीप्तिवाले होते हैं। इन्हें आत्मप्रकाश दिखता है। 

६. ( विप्राः ) = [ वि+प्रा ] ये अपना विशेष रूप से पूरण करनेवाले होते हैं। 

७. ( नविष्ठया ) = [ नु स्तुतौ ] अत्यन्त स्तुत्य अथवा प्रभु-स्तवन की उत्तम भावना से युक्त ( मती ) = [ मत्या ] बुद्धि से ये युक्त होते हैं। इनका प्रभु-स्तवन यान्त्रिक-सा [ mechanical ] न होकर बुद्धिपूर्वक होता है। 

८. प्रभु से ये यही आराधना करते हैं कि हे ( इन्द्र ) = सब इन्द्रियों के वास्तविक अधिष्ठाता प्रभो! ( ते ) = आपके ( हरी ) = इन कर्मेन्द्रियपञ्चक व ज्ञानेन्द्रियपञ्चक रूप घोड़ों को ( योज नु ) =  निश्चय से हमारे साथ संयुक्त कीजिए या इन्हें कार्य में लगाये रखिए। जैसे घोड़े को रथ में जोतते हैं, इसी प्रकार मेरे इन इन्द्रियरूप घोड़ों को आप ज्ञानयज्ञ व कर्मयज्ञ में जोते रखिए। इन्द्रियाँ कर्मों में लगी रहने पर पवित्र बनती हैं, अन्यथा इनमें अपवित्रता आ जाती है। एवं, इन घोड़ों को जोते रखना ही ‘गोतम’ बनने का उपाय है।
Essence
भावार्थ — हमारा भोजन सादा हो, हम सदा प्रसन्न रहें, वासनाओं से बचें, प्रभुस्तवन को महत्त्व दें और इन्द्रियों को ज्ञान व यज्ञों में लगाये रक्खें।
Subject
‘गोतम’ बनना