Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 48

63 Mantra
3/48
Devata- यज्ञो देवता Rishi- और्णवाभ ऋषिः Chhand- ब्राह्मी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अव॑भृथ निचुम्पुण निचे॒रुर॑सि निचुम्पु॒णः। अव॑ दे॒वैर्दे॒वकृ॑तमेनो॑ऽयासिष॒मव॒ मर्त्यै॒र्मर्त्य॑कृतं पुरु॒राव्णो॑ देव रि॒षस्पा॑हि॥४८॥

अव॑भृ॒थेत्यव॑ऽभृथ। नि॒चु॒म्पु॒णेति॑ निऽचुम्पुण। नि॒चे॒रुरिति॑ निचे॒रुः। अ॒सि॒। नि॒चु॒म्पु॒ण इति॑ निऽचुम्पु॒णः। अव॑। दे॒वैः। दे॒वकृ॑त॒मिति॑ दे॒वऽकृ॑तम्। एनः॑। अ॒या॒सि॒ष॒म्। अव॑। मर्त्यैः॑। मर्त्य॑कृत॒मिति॒ मर्त्य॑ऽकृतम्। पु॒रु॒ऽराव्ण॒ इति पुरु॒ऽराव्णः॑। दे॒व॒। रि॒षः। पा॒हि॒ ॥४८॥

Mantra without Swara
अवभृथ निचुम्पुण निचेरुरसि निचुम्पुणः । अव देवैर्देवकृतमेनो यासिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतम्पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि ॥

अवभृथेत्यवऽभृथ। निचुम्पुणेति निऽचुम्पुण। निचेरुरिति निचेरुः। असि। निचुम्पुण इति निऽचुम्पुणः। अव। देवैः। देवकृतमिति देवऽकृतम्। एनः। अयासिषम्। अव। मर्त्यैः। मर्त्यकृतमिति मर्त्यऽकृतम्। पुरुऽराव्ण इति पुरुऽराव्णः। देव। रिषः। पाहि॥४८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में अगस्त्य यज्ञादि उत्तम कर्मों के जाल को तनता है, परन्तु खूबी यह कि उस जाल में फँसता नहीं, अतः यह उस मकड़ी की भाँति होता है जो जाले को तनती तो है पर उसमें उलझती नहीं। एवं, इसका नाम ‘और्णवाभ’ पड़ जाता है। 

२. निरन्तर यज्ञों में लगे रहने से इसको ही सम्बोधित करते हैं। ( अवभृथ ) = हे यज्ञ के पुतले! [ अवभृथ = Sacrifice in general ] ( निचुम्पुण ) = [ चोपति मन्दं गच्छति ] निश्चय से शान्तिपूर्वक अपने जीवन-मार्ग पर चलनेवाले अथवा [ नीचैः क्वणनः ] यज्ञों को करते हुए व्यर्थ में उनका ढिंढोरा न पीटनेवाले, बहुत शोर न करनेवाले तू ( निचेरुः असि ) = [ नितरां चरणशील ] क्रियाशील है। तेरा जीवन क्रियामय है, परन्तु तू यह ध्यान रखना कि ( निचुम्पुणः ) = शान्तिपूर्वक चलना, व्यर्थ का शोर न करना। 

३. ( देवकृतं एनः ) = देवताओं के विषय में किये गये पापों को ( देवैः ) = दिव्य गुणों के उत्पादन के द्वारा ( अव अयासिषम् ) = मैं दूर करूँ। शरीर में सब इन्द्रियाँ देवांश हैं—सूर्य चक्षुरूप से है तो अग्नि वाणीरूप से, चन्द्रमा मनरूप से है तो दिशाएँ श्रोत्ररूप से। इन देवों के विषय में पाप यही है कि हम इनका ठीक प्रयोग नहीं करते। ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञानप्राप्ति में लगें, कर्मेन्द्रियाँ उत्तम कर्मों में और मन शिवसंकल्प में। यही मार्ग है देवकृत पापों को दूर करने का, यही मार्ग है दिव्य गुणों की प्राप्ति का। 

४. ( मर्त्यकृतम् ) [ एनः ] = मनुष्यों के विषय में किये गये पाप को मैं ( मर्त्यैः ) = [ मरणधर्मैः शरीरैः—द० ] मरणधर्म शरीरों से ( अव अयासिषम् ) = दूर करूँ, अर्थात् मनुष्यों के हित के लिए अपने शारीरिक सुखों का त्याग करके और अन्ततः अपने शरीर का भी बलिदान करके हम मर्त्यकृत पाप का प्रायश्चित्त कर पाते हैं। 

५. ( देव ) = दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभो! आप हमें ( पुरुराव्णः ) [ रु शब्दे रावयति ] = बहुतों को रुलानेवाली ( रिषः ) = हिंसा से ( पाहि ) = बचाइए। हमारे कर्म हिंसा करके पीड़न के द्वारा रुलानेवाले न हों। हमारे कर्म सत्य हों, सत्य कर्म वही हैं जो अधिक-से-अधिक हित करनेवाले हैं ‘यद् भूतहितमत्यन्तं तत् सत्यमिति धारणा’।
Essence
भावार्थ — हम यज्ञमय जीवनवाले हों, परन्तु बिना शोर के शान्तभाव से इन यज्ञों में लगे रहें। हमारे यज्ञ महान् हों, नकि उनका आडम्बर महान् हो।
Subject
अवभृथ-निचुम्पुण