Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 4

63 Mantra
3/4
Devata- अग्निर्देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उप॑ त्वाग्ने ह॒विष्म॑तीर्घृ॒ताची॑र्यन्तु हर्यत। जु॒षस्व॑ स॒मिधो॒ मम॑॥४॥

उप॑। त्वा॒। अ॒ग्ने॒। ह॒विष्म॑तीः। घृ॒ताचीः॑। य॒न्तु॒। ह॒र्य्य॒त॒। जु॒षस्व॑। स॒मिध॒ऽइति॑ स॒म्ऽइधः॑। मम॑ ॥४॥

Mantra without Swara
उप त्वाग्ने हविष्मतीर्घृताचीर्यन्तु हर्यत । जुषस्व समिधो मम ॥

उप। त्वा। अग्ने। हविष्मतीः। घृताचीः। यन्तु। हर्य्यत। जुषस्व। समिधऽइति सम्ऽइधः। मम॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे ( अग्ने ) = मेरी उन्नति के साधक प्रभो! ( हर्यत ) = [ हर्य गतिकान्त्योः ] मेरी सब क्रियाओं के स्रोत व चाहने योग्य प्रभो! ( मम ) = मेरी ( समिधः ) = ज्ञानदीप्तियाँ ( त्वा उपयन्तु ) = आपके समीप प्राप्त हों। ज्ञान मुझे निरन्तर आपके समीप प्राप्त करानेवाला हो। ‘मेरी ये ज्ञानदीप्तियाँ कैसी हैं ? 

१. ( हविष्मतीः ) = ये उत्तम हविवाली हैं—त्यागपूर्वक अदनवाली हैं। ज्ञान का पहला परिणाम मेरे जीवन पर यह होता है कि मेरी अकेले खाने की वृत्ति प्रायः समाप्त हो जाती है—मैं औरों के साथ मिलकर खाता हूँ। मैं अपनी सम्पत्ति का पाँचों यज्ञों में विनियोग करके यज्ञशेष को खानेवाला बनता हूँ। यह यज्ञशेष ही तो अमृत है—अतः मेरा भोजन ‘अमृतसेवन’ हो जाता है। 

२. ( घृताचीः ) = [ घृत अञ्च् ] मल के क्षरण से युक्त है। ज्ञान का परिणाम मल का दूर करना है। ज्ञान ‘पवित्र’ है—‘नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’। एवं, ज्ञान के मेरे जीवन में दो परिणाम होते हैं—पवित्रता और त्याग।

हे प्रभो! मेरी इन ज्ञानदीप्तियों को ( जुषस्व ) = आप प्रीतिपूर्वक सेवन कीजिए—ये आपको प्रसन्न करनेवाली हों। जैसे पिता पुत्र के ऊँचे ज्ञान से प्रसन्न होता है—उसके प्रथम स्थान में उत्तीर्ण होने से प्रीति का अनुभव करता है, उसी प्रकार मेरा ज्ञान आपको प्रसन्न करे।

मेरा ज्ञान मेरे जीवन में पवित्रता व त्याग उत्पन्न करता है। पवित्र व यज्ञिय जीवनवाला बनकर मैं सब प्रजाओं के हित में प्रवृत्त होता हूँ और प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘प्रजापति’ बनता हूँ।
Essence
भावार्थ — मुझे अनासक्त व पवित्र बनानेवाली मेरी ज्ञानदीप्तियाँ मुझे प्रभु के समीप पहुँचानेवाली हों—ये मुझे प्रभु का प्रिय बनाएँ। लोकहित में प्रवृत्त होकर मैं ‘प्रजापति’ बनूँ।
Subject
ज्ञान का परिणाम — ‘पवित्रता व त्याग’