Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 27

63 Mantra
3/27
Devata- अग्निर्देवता Rishi- श्रुतबन्धुर्ऋषिः Chhand- विराट् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इड॒ऽएह्यदि॑त॒ऽएहि॒ काम्या॒ऽएत॑। मयि॑ वः काम॒धर॑णं भूयात्॥२७॥

इडे॑। आ। इ॒हि॒। अदि॑ते। आ। इ॒हि॒। काम्याः॑। आ। इ॒त॒। मयि॑ वः॒। का॒म॒धर॑ण॒मिति॑ काम॒ऽधर॑णम्। भू॒या॒त् ॥२७॥

Mantra without Swara
इडऽएह्यदित एहि काम्या एत । मयि वः कामधरणम्भूयात् ॥

इडे। आ। इहि। अदिते। आ। इहि। काम्याः। आ। इत। मयि वः। कामधरणमिति कामऽधरणम्। भूयात्॥२७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का सुबन्धु ज्ञानी मित्रों के सम्पर्क में रहकर खूब ज्ञानी बनता है। वह वेदवाणी को अपनाता है। इस वेदवाणी के अपनाने से यह ‘श्रुतबन्धु’ = ज्ञानरूप मित्रवाला हो जाता है। यह वेदवाणी से ही कहता है— १. ( इडे ) = हे वेदवाणी! ( एहि ) = तू मुझे प्राप्त हो। तू इडा = A Law [ इ+डा = ला Law ] मेरे जीवन का नियम है। वस्तुतः प्रभु ने सृष्टि के आरम्भ में इसे एक कानून के रूप में ही हमें दिया है। 

२. ( अदिते ) = हे अखण्डित रहनेवाली वेदवाणी! तू ( एहि ) = मुझे प्राप्त हो। इस वेदवाणी से हमारे स्वास्थ्य आदि अखण्डित रहते हैं। यह वेदवाणी स्वयं भी उस अनादि-अनन्त प्रभु का ज्ञान होने से ‘अखण्डित-अविनश्वर’ है। 

३. ( काम्याः ) = इस वेदवाणी की सब ‘ऋचाएँ—यजु व साम’ कामना के योग्य हैं—चाहने योग्य हैं। हे कमनीय वेदवाणियो! ( एत ) = हमें प्राप्त होओ। ( वः ) = आपका ( मयि ) = मुझमें ( कामधरणम् ) =  इच्छापूर्वक धारण ( भूयात् ) = हो। ‘काम्यो हि वेदाधिगमः’, इन मनु के शब्दों के अनुसार मैं वेदज्ञान की कामनावाला होऊँ। इसमें निहित ज्ञान को मैं अपना बन्धु बनाऊँ और ‘श्रुतबन्धु’ नामवाला होऊँ।
Essence
भावार्थ — वेदवाणी जीवन का नियम है। यह अखण्डन व स्वास्थ्य को प्राप्त करानेवाली है, चाहने योग्य है। मैं इच्छा से इसका धारण करनेवाला बनूँ।
Subject
वेदवाणी का ‘काम-धरण’