Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 26

63 Mantra
3/26
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सुबन्धुर्ऋषिः Chhand- स्वराट् बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
तं त्वा॑ शोचिष्ठ दीदिवः सु॒म्नाय॑ नू॒नमी॑महे॒ सखि॑भ्यः। स नो॑ बोधि श्रु॒धी हव॑मुरु॒ष्या णो॑ऽअघाय॒तः स॑मस्मात्॥२६॥

तम्। त्वा॒। शो॒चि॒ष्ठ। दी॒दि॒व॒ इति॑ दीदिऽवः। सु॒म्नाय॑। नू॒नम्। ई॒म॒हे॒। सखि॑भ्य॒ इति॒ सखि॑ऽभ्यः। सः। नः॒। बो॒धि॒। श्रु॒धि। हव॑म्। उ॒रु॒ष्य। नः॒। अ॒घा॒य॒त इत्य॑घऽयतः। स॒म॒स्मा॒त् ॥२६॥

Mantra without Swara
तन्त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः । स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्या णोऽ अधायतः समस्मात् ॥

तम्। त्वा। शोचिष्ठ। दीदिव इति दीदिऽवः। सुम्नाय। नूनम्। ईमहे। सखिभ्य इति सखिऽभ्यः। सः। नः। बोधि। श्रुधि। हवम्। उरुष्य। नः। अघायत इत्यघऽयतः। समस्मात्॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. सुबन्धु प्रार्थना करता है— हे ( शोचिष्ठ ) = गत मन्त्र में वर्णित ‘द्युमत्तमं रयिम्’ को देकर हमारे जीवनों को शुचि बनानेवाले! ( दीदिवः ) = देदीप्यमान प्रभो! ( तं त्वा ) = उस आपसे ( नूनम् ) = निश्चय से ( सुम्नाय ) = सुख के लिए ( ईमहे ) = याचना करते हैं। साथ ही ( सखिभ्यः ) = ऐसे साथियों के लिए जोकि मिलकर ज्ञान की ही चर्चा करनेवाले हों, उन सखाओं के लिए याचना करते हैं। ऐसे साथियों के सम्पर्क से ही हम इस संसार-यात्रा में आगे बढ़ेंगे। 

२. ( सः ) = आप ( नः ) = हमें ( बोधि ) = बोध से युक्त कीजिए। ज्ञानप्रवण मित्रों के सम्पर्क में रहकर हमारा ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता चले। हे प्रभो! ( हवम् ) = हमारी इस पुकार को आप ( श्रुधी ) = अवश्य सुनिए और ( नः ) = हमें ( अघायतः ) = अघ—बुराई व पाप को चाहनेवाले ( समस्मात् ) = सब लोगों से ( उरुष्य ) = बचाइए। पाप की चर्चा करनेवालों के सम्पर्क में हम न आएँ। यह चर्चा अकल्याण का ही कारण बनती  है।
Essence
भावार्थ — हम ज्ञान-रुचिवाले मित्रों के सम्पर्क में आकर अधिक और अधिक बोधवाले हों। अशुभ चर्चाओं में रुचिवाले मित्रों से हम सदा बचे रहें।
Subject
पापकथा से बचाइए