Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 18

63 Mantra
3/18
Devata- अग्निर्देवता Rishi- अवत्सार ऋषिः Chhand- निचृत् ब्राह्मी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इन्धाना॑स्त्वा श॒तꣳ हिमा॑ द्यु॒मन्त॒ꣳ समि॑धीमहि। वय॑स्वन्तो वय॒स्कृत॒ꣳ सह॑स्वन्तः सह॒स्कृत॑म्। अग्ने॑ सपत्न॒दम्भ॑न॒मद॑ब्धासो॒ऽअदा॑भ्यम्। चित्रा॑वसो स्व॒स्ति ते॑ पा॒रम॑शीय॥१८॥

इन्धा॑नाः। त्वा॒। श॒तम्। हिमाः॑। द्यु॒मन्त॒मिति॑ द्यु॒ऽमन्त॑म्। सम्। इ॒धी॒म॒हि॒। वय॑स्वन्तः। व॒य॒स्कृत॑म्। व॒य॒स्कृत॒मिति॑ वयः॒ऽकृत॑म्। सह॑स्वन्तः। स॒ह॒स्कृत॑म्। स॒ह॒स्कृत॒मिति॑ सहः॒ऽकृत॑म्। अग्ने॑। स॒प॒त्न॒दम्भ॑न॒मिति॑ सपत्न॒ऽदम्भ॑नम्। अद॑ब्धासः। अदा॑भ्यम्। चित्रा॑वसो। चि॑त्रवसो॒ऽइति॒ चित्र॑ऽवसो। स्व॒स्ति। ते। पा॒रम्। अ॒शी॒य॒ ॥१८॥

Mantra without Swara
इन्धानास्त्वा शतँ हिमा द्युमन्तँँ समिधीमहि । वयस्वन्तो वयस्कृतँँ सहस्वन्तः सहस्कृतम् । अग्ने सपत्नदम्भनमदब्धासोऽअदाभ्यम् । चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय ॥

इन्धानाः। त्वा। शतम्। हिमाः। द्युमन्तमिति द्युऽमन्तम्। सम्। इधीमहि। वयस्वन्तः। वयस्कृतम्। वयस्कृतमिति वयःऽकृतम्। सहस्वन्तः। सहस्कृतम्। सहस्कृतमिति सहःऽकृतम्। अग्ने। सपत्नदम्भनमिति सपत्नऽदम्भनम्। अदब्धासः। अदाभ्यम्। चित्रावसो। चित्रवसोऽइति चित्रऽवसो। स्वस्ति। ते। पारम्। अशीय॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे प्रभो! ( द्युमन्तम् ) = ज्योतिर्मय आपको—ज्ञानस्वरूप ‘विशुद्धाचित्’ आपको ( शतं हिमाः ) = सौ वर्षपर्यन्त ( इन्धानाः ) = अपने हृदय-मन्दिर में दीप्त करते हुए ( समिधीमहि ) = इस जीवन में हम खूब दीप्त हों। 

२. ( वयस्वन्तः ) = उत्तम आयुष्यवाले हम ( वयस्कृते ) = उत्तम आयुष्य के कारणभूत आपको अपने में दीप्त करें। हम अपने जीवन को उज्ज्वल बनाएँ, परन्तु हमें यह सदा स्पष्ट हो कि हमारे जीवन की उज्ज्वलता का कारण आप ही हैं। 

३. ( सहस्वन्तः ) =  उत्तम सहस् [ बल+सहनशक्ति ]-वाले होते हुए ( सहस्कृतम् ) = इस सहस् को उत्पन्न करनेवाले आपको हम अपने में समिद्ध करें। ‘सहोऽसि’ इन शब्दों के अनुसार हम यह न भूल जाएँ कि सारे सहस् के उद्गमस्थान आप ही हैं। 

४. हे ( अग्ने ) = हमारी अग्रगति के साधक प्रभो! ( सपत्नदम्भनम् ) = हमारे ‘काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मत्सर’ आदि सब सपत्नों—शत्रुओं के नष्ट करनेवाले आपको हम अपने में समिद्ध करते हैं। परिणामतः ( ‘अदब्धासः’ ) = दबनेवाले न होते हुए ( अदाभ्यम् ) = दबाये न जा सकनेवाले आपको हम अपने में समिद्ध करते हैं। वस्तुतः आपके कारण ही तो हम इन शत्रुओं से हिंसित नहीं होते। 

५. ( चित्रावसो ) = [ चित्+र+वस् ] उत्तम ज्ञान देकर हमें उत्तमता से बसानेवाले हे प्रभो! ( स्वस्ति ) = आपके दिये इस वेदज्ञान से हमारा जीवन उत्तम हो। वस्तुतः देवता जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे उत्तम ज्ञान प्राप्त करा देते हैं। नाश का उपाय बुद्धि को छीन लेना है और जीवन का उपाय बुद्धि का प्रापण।

६. हे प्रभो! मैं ( ते ) = आपके दिये इस वेदज्ञान के सहारे ( पारम् ) = इस भवसागर के पार को ( अशीय ) = प्राप्त करूँ। यह ज्ञान ही मुझे सब वासनाओं को जीतने में समर्थ बनाएगा।
Essence
भावार्थ — प्रभु-कृपा से हमें उत्तम जीवन, सहनशक्ति, शत्रुओं के नाशन की शक्ति तथा वह ज्ञान प्राप्त होता है जिससे हम कुशलता से इस भवसागर को तैर पाते हैं।
Subject
चित्रावसु