Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 13

63 Mantra
3/13
Devata- इन्द्राग्नी देवते Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒भा वा॑मिन्द्राग्नीऽआहु॒वध्या॑ऽउ॒भा राध॑सः स॒ह मा॑द॒यध्यै॑। उ॒भा दा॒तारा॑वि॒षा र॑यी॒णामु॒भा वाज॑स्य सा॒तये॑ हुवे वाम्॥१३॥

उ॒भा। वा॒म्। इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ऽइती॑न्द्राग्नी। आ॒हु॒वध्या॒ऽइत्या॑ऽहु॒वध्यै॑। उ॒भा। राध॑सः। स॒ह। मा॒द॒यध्यै॑। उ॒भा। दा॒तारौ॑। इ॒षाम्। र॒यी॒णाम्। उ॒भा। वाज॑स्य। सा॒तये॑। हु॒वे। वा॒म् ॥१३॥

Mantra without Swara
उभा वामिन्द्राग्नीऽआहुवध्याऽउभा राधसः सह मादयध्यै । उभा दाताराविषाँ रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम् ॥

उभा। वाम्। इन्द्राग्नीऽइतीन्द्राग्नी। आहुवध्याऽइत्याऽहुवध्यै। उभा। राधसः। सह। मादयध्यै। उभा। दातारौ। इषाम्। रयीणाम्। उभा। वाजस्य। सातये। हुवे। वाम्॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र की भावनावाले व्यक्ति जब ‘पति-पत्नी’ बनते हैं तब उनके अन्दर जो बातें विशेषरूप से दिखती हैं, वे ये हैं— १. पति इन्द्रियों का अधिष्ठाता—जितेन्द्रिय होने से बल-सम्पन्न होकर ‘इन्द्र’ नामवाला होता है। घर की उन्नति का कारण होने से पत्नी को यहाँ ‘अग्नि’ कहा गया है। पति ‘बल’ का प्रतीक है तो पत्नी ‘प्रकाश’ की। ( इन्द्राग्नी ) = हे पति-पत्नी! ( वाम् उभा ) = आप दोनों ( आहुवध्या ) = प्रभु को पुकारनेवाले [ भवतम् ] होते हो। उत्तम जीवनवाले पति-पत्नी मिलकर प्रभु की उपासना करते हैं। यह प्रभुभक्ति ही इनके सारे जीवन-सौन्दर्य का कारण है। 

२. ( उभा ) = दोनों ही ( राधसः ) = सफलता व सम्पत्ति का ( सह ) = मिलकर ( मादयध्यै ) = आनन्द लेनेवाले [ भवतम् ] होते हो। घर में होनेवाली सफलताओं व सम्पत्तियों को इनमें से कोई एक अपनी महिमा की सूचक नहीं मानता। ‘इनको प्राप्त करने में दोनों का भाग है’, ऐसा वे समझते हैं। यह समझना ही उन्हें परस्पर प्रेमवाला बनाये रखता है और वे एक-दूसरे को छोटा नहीं समझते। 

३. ( उभा ) = दोनों ( इषाम् ) = अन्नों के व ( रयीणाम् ) = धनों के ( दातारौ ) = देनेवाले होते हैं। इनके घर से कोई याचक कभी निराश नहीं लौटता। 

४. इस प्रकार [ क ] प्रभु के पुजारी [ ख ] मिलकर धन-सम्पत्ति का आनन्द उठानेवाले [ ग ] अन्नों व धनों के देनेवाले ये पति-पत्नी ( उभा ) = दोनों ( वाजस्य ) = शक्ति की ( सातये ) = प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होते हैं। इनका जीवन विषय-वासनाओंवाला न होने से इनकी शक्ति स्थिर रहती है। विषय ही इन्द्रिय-शक्तियों को जीर्ण करते हैं। अपने अन्दर शक्ति को भरनेवाले ये सचमुच ‘भरद्वाज’ बनते हैं, प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि होते हैं।

५. इस प्रकार पति-पत्नी के चार मुख्य गुण हैं— ‘प्रभु-भजन’, ‘सम्पत्ति का सम्पादन’, ‘दान’ तथा ‘शक्तिसम्पन्न बने रहना’। इन गुणोंवाले पति-पत्नी का जीवन सचमुच सुन्दर होता है। मन्त्र का ऋषि कहता है कि ( वाम् हुवे ) = आप दोनों की मैं स्पर्धा करता हूँ [ ह्वेञ् = स्पर्धायाम् ]। मैं भी अपने जीवन को ऐसा बनाने का प्रयत्न करता हूँ, प्रभु से ऐसे ही जीवन के लिए प्रार्थना करता हूँ।
Essence
भावार्थ — पति-पत्नी के जीवन ‘प्रभु-पूजन, धन-सम्पादन, दानशीलता व शक्ति’ वाले हों। ऐसे ही जीवन अनुकरणीय व आकांक्षणीय हैं।
Subject
पति-पत्नी के मौलिक गुण