Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 11

63 Mantra
3/11
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒प॒प्र॒यन्तो॑ऽअध्व॒रं मन्त्रं॑ वोचेमा॒ग्नये॑। आ॒रेऽअ॒स्मे च॑ शृण्व॒ते॥११॥

उ॒प॒प्र॒यन्त॒ इत्यु॑पऽप्र॒यन्तः॑। अ॒ध्व॒रम्। मन्त्र॑म्। वो॒चे॒म॒। अ॒ग्नये॑। आ॒रे। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। च॒ शृ॒ण्व॒ते ॥११॥

Mantra without Swara
उपप्रयन्तोऽअध्वरं मन्त्रँवोचेमाग्नये । आरेऽअस्मे च शृण्वते ॥

उपप्रयन्त इत्युपऽप्रयन्तः। अध्वरम्। मन्त्रम्। वोचेम। अग्नये। आरे। अस्मेऽइत्यस्मे। च शृण्वते॥११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु-प्राप्ति के लिए गत मन्त्र में तीसरी बात कही थी ( जुषाणः ) = प्रीतिपूर्वक सेवन करता हुआ। ‘किन बातों का प्रीतिपूर्वक सेवन करता हुआ ?’ यह विषय प्रस्तुत मन्त्र का है। 

१. ( अध्वरम् ) = [ अ+ध्वर—कुटिलता व हिंसा ] इस जीवन-यात्रा में कुटिलता व हिंसा से रहित यज्ञों के ( उपप्रयन्तः ) = समीप जाते हुए ( अग्नये ) = उस अग्रेणी प्रभु की प्राप्ति के लिए ( मन्त्रं वोचेम ) = मन्त्रों का उच्चारण करें। प्रभु-प्राप्ति के दो साधन हैं—[ क ] हमारे हाथ अध्वरों में व्याप्त हों और हमारी वाणी ज्ञान की बातों का उच्चारण करे। कर्मेन्द्रियाँ अहिंसात्मक व कुटिलताशून्य कर्मों में लगी हों और ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान की वाणियों का ग्रहण करने में व्याप्त हों। ऐसा होने पर ही हम उस प्रभु को प्राप्त होंगे जो ‘अग्नि’ हैं—हमारी सब उन्नतियों के साधक हैं। वे प्रभु ( आरे ) = दूर और ( अस्मे ) = [ अस्माकं समीपे इतिशेषः = महीधर ] समीप ( शृण्वते ) = हमारे वचन को सुनते हैं। हमारी प्रार्थना उस प्रभु से सुनी जाती है, जो प्रभु हमारी सब उन्नतियों के साधक हैं।

प्रभु-प्राप्ति के लिए सदा मन्त्रों का पाठ करते हुए यह उत्तम ज्ञानवाला ‘गोतम’ बनता है और अध्वरों में लगा हुआ यह कुटिलता व हिंसा का त्याग करनेवाला [ रह-त्यागे ] त्यागियों में गिनने के योग्य ‘राहूगण’ होता है। यह ‘गोतम राहूगण’ ही प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है।
Essence
भावार्थ — हमारे हाथ अध्वरों [ यज्ञों ] में व्याप्त हों और हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ मन्त्रों में। इस प्रकार उत्तम कर्मों व ज्ञान के द्वारा हम प्रभु को प्राप्त करने के अधिकारी हों।
Subject
हाथों में ‘अध्वर’, वाणी में ‘मन्त्र’