Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 1

63 Mantra
3/1
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषिः Chhand- गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन॥१॥

स॒मिधेति॑ स॒म्ऽइधा॑। अ॒ग्निम्। दु॒व॒स्य॒त॒। घृ॒तैः। बो॒ध॒य॒त॒। अति॑थिम्। आ। अ॒स्मि॒न्। ह॒व्या। जु॒हो॒त॒न॒ ॥१॥

Mantra without Swara
समिधाग्निन्दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् आस्मिन्हव्या जुहोतन ॥

समिधेति सम्ऽइधा। अग्निम्। दुवस्यत। घृतैः। बोधयत। अतिथिम्। आ। अस्मिन्। हव्या। जुहोतन॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत अध्याय की समाप्ति पर आचार्य के गर्भ में रहकर एक कुमार के मस्तिष्क में ज्ञानसूर्य के उदय होने का उल्लेख हुआ था। प्रस्तुत मन्त्र में ज्ञानसूर्य की दीप्तिवाला यह कुमार अपनी ज्ञानदीप्ति से प्रभु की परिचर्या करता है। 

२. ( समिधा ) = [ सम्+इन्ध् = दीप्ति ] ज्ञानदीप्ति से ( अग्निम् ) = अग्रेणी प्रभु की ( दुवस्यत ) = परिचर्या करो। प्रभु को यह ज्ञानीभक्त ही तो आत्मतुल्य प्रिय है। 

३. ( घृतैः ) = मलों के क्षरण—दूरीकरण से [ घृ-क्षरण ] ( अतिथिम् ) = [ अत सातत्यगमने, गमन = प्राप्ति ] सतत दीप्त उस प्रभु को—सदा से हृदय में निवास करनेवाले अन्तर्यामी को— ( बोधयत ) = उद्बुद्ध करो। प्रभु की ज्योति मल के आवरण से अदृष्ट हो रही है, मलावरण के हटते ही वह उद्बुद्ध-सी हो जाती है। 

४. ( अस्मिन् ) = इस उद्बुद्ध प्रभु-ज्योति में ( हव्या ) = अपनी सब हवियों को—अपने सब उत्तम कर्मों को— ( आजुहोतन ) = आहुत कर दो। अपने सब यज्ञादि कर्मों को प्रभु-चरणों में अर्पित करनेवाले बनो। 

५. सामान्य अग्निहोत्र में भी क्रम यही होता है कि समिधाओं से अग्नि को दीप्त करते हैं—घृत से उसे उद्बुद्ध करते हैं और फिर उसमें हव्यों को डालते हैं। यहाँ अध्यात्म यज्ञ का क्रम भी यही है कि ज्ञानदीप्ति से प्रभु की उपासना करें—इस ज्ञानदीप्ति में ‘पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक’ के पदार्थों का ज्ञान ही तीन समिधाएँ कहलाती हैं। उसके बाद यहाँ वासनात्मक मलों के क्षरणरूप ‘घृत’ से अपने अन्दर विद्यमान उस प्रभु का उद्बोधन होता है और इस प्रभु के चरणों में यह ज्ञानीभक्त अपने सब यज्ञात्मक कर्मों को अर्पित करता है। 

६. इस प्रकार ज्ञानदीप्त, निर्मलान्तःकरण, प्रभु-चरणों में अपना अर्पण करनेवाला यह व्यक्ति विशिष्ट ही रूपवाला हो जाता है, अतः ‘विरूप’ कहलाता है और अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रस के सञ्चार के कारण यह ‘आङ्गिरस’ कहलाता है।
Essence
भावार्थ — हम ज्ञानार्जन करें, हृदय को निर्मल करें और अपने सब कर्मों को प्रभु में अर्पण करनेवाले बनें।
Subject
ज्ञान, नैर्मल्य, अर्पण