Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 9

60 Mantra
29/9
Devata- त्वष्टा देवता Rishi- बृहदुक्थो वामदेव्य ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वष्टा॑ वी॒रं दे॒वका॑मं जजान॒ त्वष्टु॒रर्वा॑ जायतऽआ॒शुरश्वः॑।त्वष्टे॒दं विश्वं॒ भुव॑नं जजान ब॒होः क॒र्त्तार॑मि॒ह य॑क्षि होतः॥९॥

त्वष्टा॑। वी॒रम्। दे॒वका॑म॒मिति॑ दे॒वऽका॑मम्। ज॒जा॒न॒। त्वष्टुः॑। अर्वा॑। जा॒य॒ते॒। आ॒शुः। अश्वः॑। त्वष्टा॑। इ॒दम्। विश्व॑म्। भुव॑नम्। ज॒जा॒न॒। ब॒होः। क॒र्त्तार॑म्। इ॒ह। य॒क्षि॒। हो॒त॒रिति॑ होतः ॥९ ॥

Mantra without Swara
त्वष्टा वीरन्देवकामञ्जजान त्वष्टुरर्वा जायत आशुरश्वः । त्वष्टेदँविश्वम्भुवनञ्जजान बहोः कर्तारमिह यक्षि होतः ॥

त्वष्टा। वीरम्। देवकाममिति देवऽकामम्। जजान। त्वष्टुः। अर्वा। जायते। आशुः। अश्वः। त्वष्टा। इदम्। विश्वम्। भुवनम्। जजान। बहोः। कर्त्तारम्। इह। यक्षि। होतरिति होतः॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. 'त्वष्टा' शब्द ' त्विषेर्वा स्याद् दीप्तिकर्मणः' त्विष धातु से बनकर ज्ञान से दीप्त आचार्य का वाचक है। 'त्वक्षेतेर्वा स्यात् करोति कर्मणः' त्वक्ष धातु से बनकर यह उत्तम विद्यार्थी का निर्माण करनेवाले आचार्य का वाचक है। यह (त्वष्टा) = ज्ञानदीप्त आचार्य (वीरम्) = वीरता से युक्त, वीर भावनावाले (देवकामम्) = देवताओं की कामनावाले शिष्य को (जजान) = द्वितीय जन्म देता है। माता-पिता से पैदा हुए हुए इस विद्यार्थी को आचार्य वीर व दिव्यगुणों की कामनावाला बनाकर एक नया जन्म दे देता है। २. (त्वष्टुः) = इस विद्यार्थी के उत्तम जीवन का निर्माण करनेवाले आचार्य से अर्वा काम, क्रोधादि वासनाओं का संहार करनेवाला, (आशुः) = शीघ्रता से कार्य करनेवाला (अश्वः) = सदा कर्मों में व्याप्त व्यक्ति (जायते) = उत्पन्न होता है, अर्थात् आचार्य विद्यार्थी को इस प्रकार की शिक्षा देता है कि वह वासनाओं को जीतनेवाला, कर्मव्याप्त जीवनवाला, आलस्यशून्य बनता है। ३. (त्वष्टा) = यह विद्यार्थी के जीवन का निर्माता आचार्य (इदं भुवनम्) = इस भूतग्राम को (विश्वम्) = [सर्व] पूर्ण (जजान) = बनाता है, अर्थात् यह उसके शरीर को स्वस्थ व नीरोग, मन को निर्मल, वासनाशून्य तथा मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त बनाता है। शरीर से इसे 'वसु' उत्तम निवासवाला, मन से 'रुद्र' = [रोरूयमाणो द्रवति] प्रभु नामोच्चारणपूर्वक वासनाओं पर आक्रमण करनेवाला तथा मस्तिष्क से 'आदित्य' सब ज्ञानों का आदान करनेवाला बनाता है। इसके मस्तिष्क में 'भारती' का निवास कराता है, मन में 'सरस्वती' का तथा शरीर में 'इडा' का। इस प्रकार आचार्य अपने विद्यार्थियों के जीवन को पूर्ण बनाने का प्रयत्न करता है। ४. इस प्रकार (बहोः कर्त्तारम्) = [ बह् to strengthen, to make firm ] दृढ़ व सबल जीवन का निर्माण करनेवाले इस आचार्य को इह इस ब्रह्मर्चाश्रम में हे (होत:) = आचार्य के प्रति अपना अर्पण करनेवाले विद्यार्थी ! तू (यक्षि) = आदर देनेवाला बन ।
Essence
भावार्थ- आचार्य विद्यार्थी को 'वीर, देवकाम, अर्वा, आशु, अश्व, विश्वं [पूर्ण] व बहु [दृढ़]' बनाये। विद्यार्थी आचार्य के प्रति सदा सन्मान की भावनावाला हो ।
Subject
त्वष्टा