Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 59

60 Mantra
29/59
Devata- अग्न्यादयो देवताः Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- भुरिगतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒ग्नयेऽनी॑कवते॒ रोहि॑ताञ्जिरन॒ड्वान॒धोरा॑मौ सावि॒त्रौ पौ॒ष्णौ र॑ज॒तना॑भी वैश्वदे॒वौ पि॒शङ्गौ॑ तूप॒रौ मा॑रु॒तः क॒ल्माष॑ऽआग्ने॒यः कृ॒ष्णोऽजः सार॑स्व॒ती मे॒षी वा॑रु॒णः पेत्वः॑॥५९॥

अ॒ग्नये॑। अनी॑कवत॒ इन्यनी॑कऽवते। रोहि॑ताञ्जि॒रिति॒ रोहि॑तऽअञ्जिः। अ॒न॒ड्वान्। अ॒धोरा॑मा॒वित्य॒धःरा॑मौ। सा॒वि॒त्रौ। पौ॒ष्णौ। र॒ज॒तना॑भी॒ इति॑ रज॒तऽना॑भी। वै॒श्व॒दे॒वाविति॑ वैश्वऽदे॒वौ। पि॒शङ्गौ॑। तू॒प॒रौ। मा॒रु॒तः। क॒ल्माषः॑। आ॒ग्ने॒यः। कृ॒ष्णः। अ॒जः। सा॒र॒स्व॒ती। मे॒षी। वा॒रु॒णः। पेत्वः॑ ॥५९ ॥

Mantra without Swara
अग्नयेनीकवते रोहिताञ्जिरनड्वानधोरामौ सावित्रौ पौष्णौ रजतनाभी वैश्वदेवौ पिशङ्गौ तूपरौ मारुतः कल्माषऽआग्नेयः कृष्णो जः सारस्वती मेषी वारुणः पेत्वः ॥

अग्नये। अनीकवत इन्यनीकऽवते। रोहिताञ्जिरिति रोहितऽअञ्जिः। अनड्वान्। अधोरामावित्यधःरामौ। सावित्रौ। पौष्णौ। रजतनाभी इति रजतऽनाभी। वैश्वदेवाविति वैश्वऽदेवौ। पिशङ्गौ। तूपरौ। मारुतः। कल्माषः। आग्नेयः। कृष्णः। अजः। सारस्वती। मेषी। वारुणः। पेत्वः॥५९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (रोहिताञ्जिः) = [रोहितोऽञ्जिस्तिलको यस्य] लाल तिलकवाला (अनड्वान्) = वृषभ (अनीकवते) = सेनावाले, अर्थात् सेना के सञ्चालन करनेवाले (अग्नये) = अग्रेणी सेनापति के लिए है, अर्थात् रोहिताञ्जि अनड्वान् सेनापति का सूचक चिह्न है। २. (अधोरामौ) = निचले भाग में श्वेत दो पशु (सावित्रौ) = सविता के गुणधर्मवाले हैं, अर्थात् श्वेत अधोभागवाले दो पशु [श्वेत-शुक्र-शुक्ल] (सावित्रौ) = पति-पत्नी के प्रतीक हैं, जो अधोभाग में वर्त्तमान इन्द्रियों से रमण करते हुए सन्तान को जन्म देते हैं । ३. (रजतनाभी) = रजत के समान नाभिवाले दो पशु (पौष्णौ) = पूषा देवता के गुणधर्मोंवाले हैं। प्रजाओं का पालन-पोषण करनेवाले धनी स्त्री-पुरुषों के ये पशु प्रतीक हैं, ये धनी स्त्री-पुरुष भी रजत व धन से सभी को अपने साथ बाँधे रहते हैं [नह बन्धने] । ४. (पिशङ्गौ) = पिङ्गल वर्णवाले (तूपरौ) = नि:शृंग दो पशु (वैश्वदेवौ) = विश्वदेव देवतावाले हैं। सब देवता तेजस्विता के कारण सुवर्ण के समान पीत वर्णवाले होते हैं और हिंसा न करने से मानो निःशृंग हैं या गर्व न करने से इनके सींग नहीं निकले हुए। ५. (कल्माषः) = खाखी वर्णवाला पशु (मारुतः) = मरुतों के गुण धर्मवाला है। मरुत = प्राण हैं, ये शरीर में विविध कार्यों को करते हुए कल्माष व चित्र-विचित्र वर्णवाले हैं। योग में प्राणों के विविध रंग माने गये हैं। ६. (कृष्णाः अजः) = कृष्णवर्ण का (अज आग्नेयः) = अग्नि के गुणधर्मवाला है। 'अग्नि' गर्म है इस कृष्ण अज से प्राप्त पशम भी बड़ी गरम होती है। अथवा अग्नि सेनापति है वह कृष्ण वर्णवाले बारूद से शस्त्रों के प्रक्षेपण [ अज = क्षेपण] द्वारा शत्रुओं को दूर भगाता है, अतः उसका प्रतीक 'कृष्ण अज' रक्खा गया है । ७. (मेषी) = भेड़ सारस्वती सरस्वती के गुण-धर्मवाली है। सरस्वती के उपासक भेड़ की भाँति ही नतमस्तक - विनीत रहते हैं और मस्तक व ज्ञान के द्वारा ही टक्कर लेते हैं। ८. (पेत्वः) = वेगवान् पशु (वारुण:) = वरुण देवतावाला है। वेगवान् पशु की भाँति वरुण भी अपने शत्रु बाधनादि कार्यों में वेगवाला होता है।
Essence
भावार्थ- पशुओं के गुणधर्मों को समझकर हम अपने प्रतीकभूत पशु के चिह्न से प्रेरणा लेनेवाले बनें।
Subject
देवगुणधर्मयुक्त पशु