Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 55

60 Mantra
29/55
Devata- वीरा देवताः Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उप॑ श्वासय पृथि॒वीमु॒त द्यां पु॑रु॒त्रा ते॑ मनुतां॒ विष्ठि॑तं॒ जग॑त्।स दु॑न्दुभे स॒जूरिन्द्रे॑ण दे॒वैर्दू॒राद् दवी॑यो॒ऽअप॑ सेध॒ शत्रू॑न्॥५५॥

उप॑। श्वा॒स॒य॒। पृ॒थि॒वीम्। उ॒त। द्याम्। पुरु॒त्रेति॑ पुरु॒ऽत्रा। ते॒। म॒नु॒ता॒म्। विष्ठि॑तम्। विस्थि॑त॒मिति॒ विऽस्थि॑तम्। जग॑त्। सः। दु॒न्दु॒भे॒। स॒जूरिति॑ स॒जूः। इन्द्रे॑ण। दे॒वैः। दू॒रात्। दवीयः॑। अप॑। से॒ध॒। शत्रू॑न् ॥५५ ॥

Mantra without Swara
उप श्वासय पृथिवीमुत द्याम्पुरुत्रा ते मनुताँविष्ठितञ्जगत् । स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयोऽअप सेध शत्रून् ॥

उप। श्वासय। पृथिवीम्। उत। द्याम्। पुरुत्रेति पुरुऽत्रा। ते। मनुताम्। विष्ठितम्। विस्थितमिति विऽस्थितम्। जगत्। सः। दुन्दुभे। सजूरिति सजूः। इन्द्रेण। देवैः। दूरात्। दवीयः। अप। सेध। शत्रून्॥५५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (दुन्दुभे) = दुन्दुशब्द से शत्रुओं को भयभीत करनेवाली दुन्दुभे! तू (पृथिवीम्) = पृथिवी को (उत) = और (द्याम्) = द्युलोक को (उपश्वासय) = गुञ्जित कर दे [उपशब्दय-उ०]। २. (पुरुत्रा) = बहुत-से स्थानों पर अर्थात् भिन्न-भिन्न स्थानों पर (विष्ठितम्) = विशेषरूप से स्थित हुआ-हुआ यह जगत्-सारा लोक (ते मनुताम्) = तुझे जाने, तेरा विचार करे । 'इतना आयत, दीर्घ व भयंकर शब्द कहाँ से हुआ' ऐसा सब लोग सोचने लगे। ३. हे दुन्दुभे! (सः) = वह तू (इन्द्रेण) = शत्रुओं को दूर भगानेवाले राजा के (सजूः) = साथ तथा (देवैः) = युद्धक्रीड़ा के सञ्चालक अन्य सेनापतियों के साथ (शत्रून्) = शत्रुओं को (दूरात् दवीयः) = दूर से भी दूर (अपसेध) = भागा दे, रोक दे । तेरे शब्द को सुनकर शत्रु आगे बढ़ने का उत्साह ही न कर सके। तेरा शब्द उनके हृदयों को दहला दे।
Essence
भावार्थ- जब हम धर्म्य संग्राम में अवतीर्ण होते हैं, तब हमारा युद्ध के लिए किया गया आह्वान का शब्द शत्रु को भयभीत करनेवाला हो। हमारी दुन्दुभि के शब्द को सुनकर शत्रु भाग खड़े हों।
Subject
दुन्दुभि