Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 54

60 Mantra
29/54
Devata- वीरो देवता Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ म॒रुता॒मनी॑कं मि॒त्रस्य॒ गर्भो॒ वरु॑णस्य॒ नाभिः॑।सेमां नो॑ ह॒व्यदा॑तिं जुषा॒णो देव॑ रथ॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय॥५४॥

इन्द्रस्य। वज्रः॑। म॒रुता॑म्। अनी॑कम्। मि॒त्रस्य॑। गर्भः॑। वरु॑णस्य। नाभिः॑। सः। इ॒माम्। नः॒। ह॒व्यदा॑ति॒मिति॑ ह॒व्यऽदा॑तिम्। जु॒षा॒णः। देव॑। र॒थ॒। प्रति॑। ह॒व्या। गृ॒भा॒य॒ ॥५४ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकम्मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः । सेमान्नो हव्यदातिञ्जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय ॥

इन्द्रस्य। वज्रः। मरुताम्। अनीकम्। मित्रस्य। गर्भः। वरुणास्य। नाभिः। सः। इमाम्। नः। हव्यदातिमिति हव्यऽदातिम्। जुषाणः। देव। रथ। प्रति। हव्या। गृभाय॥५४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का यह शरीररूप रथ (इन्द्रस्य वज्रः) - इन्द्र का वज्र है, अर्थात् जितेन्द्रिय पुरुष का यह शरीर वज्रतुल्य दृढ़ होता है। २. यह शरीर (मरुताम्) = प्राणों की [अनीकम्] = तेजस्विता व दीप्तिवाला [splendour, brilliance] है, अर्थात् जहाँ जितेन्द्रियता से यह शरीर वज्रतुल्य दृढ़ता को प्राप्त होता है, वहाँ प्राणसाधना से यह तेज व दीप्तिवाला होता है । ३. जितेन्द्रिय पुरुष का यह शरीर प्राणसाधना करने पर (मित्रस्य गर्भः) = स्नेह की देवता का गर्भ होता है, अर्थात् स्नेह से परिपूर्ण होता है । ४. (वरुणस्य नाभिः) = द्वेष के निवारण की देवता का केन्द्र व बन्धन- [नह बन्धने] - वाला होता है। इस इन्द्र के शरीर में द्वेष के लिए स्थान नहीं रहता। यहाँ प्रेम ही प्रेम होता है । ५. हे (देवरथ) = इन्द्र, मरुत्, मित्र व वरुण आदि देवों के निवासस्थान बने हुए रथ ! (सः) = वह तू (नः) = हमारी (इमाम्) = इस (हव्यदातिम् जुषाण:) = यज्ञशेष के रूप में दिये गये भोजन को सेवन करता हुआ (प्रति) = प्रतिदिन (हव्या) = हवियों को ही (गृभाय) = ग्रहण कर, अर्थात् तू सदा हवि का सेवन करनेवाला बन । वस्तुतः देवता हविर्भुक् हैं, हवि के सेवन से ही हममें देवों की व दिव्य गुणों की वृद्धि होगी।
Essence
भावार्थ- हम हवि के सेवन से, यज्ञशेष के भोजन से अपने में शरीर की दृढ़ता प्राणों की तेजस्विता, स्नेहभाव व द्वेष निवारण को स्थिर करें।
Subject
मित्रस्य गर्भः