Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 48

60 Mantra
29/48
Devata- वीरा देवताः Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒प॒र्णं व॑स्ते मृ॒गोऽअ॑स्या॒ दन्तो॒ गोभिः॒ सन्न॑द्धा पतति॒ प्रसू॑ता। यत्रा॒ नरः॒ सं च॒ वि च॒ द्रव॑न्ति॒ तत्रा॒स्माभ्य॒मिष॑वः॒ शर्म॑ यꣳसन्॥४८॥

सु॒प॒र्णमिति॑ सुऽप॒र्णम्। व॒स्ते॒। मृ॒गः। अ॒स्याः॒। दन्तः॑। गोभिः॑। सन्न॒द्धेति सम्ऽन॑द्धा। प॒त॒ति॒। प्रसू॒तेति॒ प्रऽसू॑ता। यत्र॒। नरः॑। सम्। च॒। वि। च॒। द्रव॑न्ति। तत्र॑। अ॒स्मभ्य॑म्। इष॑वः। शर्म॑। य॒ꣳस॒न् ॥४८ ॥

Mantra without Swara
सुपर्णँ वस्ते मृगोऽअस्या दन्तो गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता । यत्रा नरः सञ्च वि च द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यँसन् ॥

सुपर्णमिति सुऽपर्णम्। वस्ते। मृगः। अस्याः। दन्तः। गोभिः। सन्नद्धेति सम्ऽनद्धा। पतति। प्रसूतेति प्रऽसूता। यत्र। नरः। सम्। च। वि। च। द्रवन्ति। तत्र। अस्मभ्यम्। इषवः। शर्म। यꣳसन्॥४८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. धानुष्क से छोड़े जानेवाला बाण (सुपर्णं वस्ते) = पक्षी के पिच्छ को धारण करता है। बाण के अग्रभाग में उसकी गति को तीव्र करने के लिए कंक आदि पक्षियों का पंख लगाया जाता है। २. (अस्या दन्तः) = इस इषु का फलका (मृगः) = लक्ष्य का मार्गण [अन्वेषण] करनेवाला होता है। ३. (गोभिः) = गोविकार श्लेष्मस्नायुओं [ताँत] से (सन्नद्धा) = अच्छी प्रकार कसकर बँधा हुआ प्रसूता धानुष्क से प्रेरित किया गया यह (इषु पतति) = शत्रुसैन्य की ओर जाता है। ४. इसके शत्रुसैन्य पर पड़ने पर रणांगण का दृश्य ऐसा हो जाता है कि (यत्र) = जिसमें (नरः) = मनुष्य (संद्रवन्ति च) = मिलकर भाग खड़े होते हैं (च) = और (विद्रवन्ति) = विरुद्ध दिशाओं में तितर-बितर हो जाते हैं। ५. इस प्रकार शत्रुसैन्य को भगाकर ये (इषवः) = बाण (तत्र) = उस रणाङ्गण में (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए शर्म (यंसन्) सुख व शान्ति देनेवाले हों।
Essence
भावार्थ - राष्ट्र की रक्षा के लिए आयुध-सामग्री ठीक से तैयार होनी चाहिए। यह शत्रुसैन्य को पराजित करके राष्ट्र में सुख व शान्ति को बढ़ानेवाली हो ।
Subject
बाण