Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 29 / Mantra 37

60 Mantra
29/37
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- मधुच्छन्छा ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्याऽअपे॒शसे॑। समु॒षद्भि॑रजायथाः॥३७॥

के॒तुम्। कृ॒ण्वन्। अ॒के॒तवे॑। पेशः॑। म॒र्याः॒। अ॒पे॒शसे॑। सम्। उ॒षद्भि॒रित्यु॒षत्ऽभिः॑। अ॒जा॒य॒थाः॒ ॥३७ ॥

Mantra without Swara
केतुङ्कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्याऽअपेशसे । समुषद्भिरजायथाः ॥

केतुम्। कृण्वन्। अकेतवे। पेशः। मर्याः। अपेशसे। सम्। उषद्भिरित्युषत्ऽभिः। अजायथाः॥३७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का यज्ञशील पुरुष सदा उत्तम इच्छाओं से सम्पन्न होता है, अतः वह प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'मधुच्छान्दा' बनता है। उसकी कामना होती है - [क] अन्धकार को दूर करने के लिए वह प्रकाश को फैलाये, [ख] निर्धनता को दूर करने के लिए वह धन के उचित संविभागवाला हो अथवा [पेशस् रूप] आहार-विहार का ठीक ज्ञान देने से लोगों को स्वस्थ बनाकर उन्हें ठीक रूप देनेवाला हो। २. मन्त्र में कहते हैं कि (अकेतवे) = अविद्यमान प्रज्ञानवाले, नासमझ के लिए (केतुम्) = प्रज्ञान को (कृण्वन्) = करता हुआ तथा [क] (अपेशसे मर्या) = [मर्याय] [ न विद्यते पेशः सुवर्णं यस्य] = अविद्यमान धनवाले के लिए (पेश:) = सुवर्ण को करता हुआ [ख] अथवा [पेश:= रूपम्] अस्वास्थ्य के कारण नष्ट सौन्दर्यवाले व्यक्ति के लिए, स्वास्थ्य के द्वारा सुन्दर रूप को करता हुआ तू (उषद्भिः) = उषा: कालों के साथ (अजायथाः) = अपनी शक्तियों का प्रादुर्भव-विकास करता है, अर्थात् उषा: काल में ही जाग उठता है और अपने कर्त्तव्यों के पालन में लगकर अपनी शक्तियों का विकास करता है।
Essence
भावार्थ- हम अज्ञानी के लिए ज्ञान दें, अधन के लिए धन देनेवाले हों तथा अरूप को स्वास्थ्य के द्वारा रूप प्रदान करें। उषा काल में ही उद्बुद्ध होकर अपने कर्त्तव्य कर्मों में लगते हुए अपनी शक्तियों का विकास करें।
Subject
उषाः जागरण